Indian Geopolitics का इतिहास भारत की उस दीर्घ यात्रा की कहानी है, जिसमें भूगोल, शक्ति और राजनीति ने मिलकर देश की रणनीतिक सोच को आकार दिया। हिमालय की पर्वतमालाओं से लेकर हिंद महासागर के विस्तृत समुद्री मार्गों तक फैला भारत केवल एक सभ्यता नहीं, बल्कि प्राचीन काल से ही वैश्विक शक्ति-संतुलन का अहम केंद्र रहा है।
इसलिए भारतीय इतिहास को केवल राजवंशों या युद्धों तक सीमित करके नहीं समझा जा सकता; इसे एक व्यापक भू-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में देखना आवश्यक है।

सरल शब्दों में, भू-राजनीति (Geopolitics) यह समझने की प्रक्रिया है कि किसी देश का भूगोल उसकी राजनीति, सुरक्षा और विदेश नीति को कैसे प्रभावित करता है। पहाड़, नदियाँ, समुद्र, सीमाएँ, प्राकृतिक संसाधन और पड़ोसी देश—ये सभी तत्व मिलकर किसी राष्ट्र की रणनीतिक प्राथमिकताओं को तय करते हैं।
भारत के संदर्भ में भू-राजनीति कोई आधुनिक अवधारणा नहीं है, बल्कि यह हजारों वर्षों से इसकी नीति और व्यवहार का हिस्सा रही है। प्राचीन भारत के समुद्री व्यापार से लेकर आधुनिक भारत की इंडो-पैसिफिक रणनीति तक, भूगोल ने हर युग में निर्णायक भूमिका निभाई है।
भारत की भौगोलिक स्थिति इसे स्वाभाविक रूप से रणनीतिक बनाती है। उत्तर में हिमालय ने जहाँ एक ओर सुरक्षा कवच का कार्य किया, वहीं मध्य एशिया से सांस्कृतिक और राजनीतिक संपर्क भी बनाए। दक्षिण में हिंद महासागर ने भारत को अफ्रीका, मध्य-पूर्व और दक्षिण-पूर्व एशिया से जोड़ा।
प्राचीन समुद्री व्यापार मार्गों, सिल्क रूट और भारतीय महासागर नेटवर्क के कारण भारत वैश्विक व्यापार और शक्ति-संतुलन का केंद्र बना। यही कारण रहा कि अलग-अलग कालखंडों में विदेशी शक्तियाँ भारत की ओर आकर्षित होती रहीं।
यदि आज की भारतीय विदेश नीति को समझना हो — चाहे वह चीन के साथ संबंध हों, नेपाल या बांग्लादेश के साथ संबंध हों या फिर पड़ोसी देशों की रणनीति हो या समुद्री सुरक्षा की बात — तो इसके ऐतिहासिक संदर्भ को समझना अनिवार्य है।
औपनिवेशिक काल में बनी सीमाएँ, 1947 का विभाजन, शीत युद्ध के दौरान लिए गए निर्णय और गुटनिरपेक्ष आंदोलन जैसी नीतियाँ आज भी भारत की रणनीतिक सोच को प्रभावित करती हैं। इतिहास केवल अतीत नहीं होता; वह वर्तमान की दिशा और भविष्य की संभावनाओं को भी तय करता है।
इसी संदर्भ में Indian Geopolitics का इतिहास हमें यह समझने का अवसर देता है कि कैसे अलग-अलग युगों में भारत की भू-राजनीतिक प्राथमिकताएँ बदलीं।
प्राचीन भारत की सामुद्रिक और स्थल आधारित रणनीतियाँ, मध्यकालीन साम्राज्यों का शक्ति-संतुलन, यूरोपीय आगमन और औपनिवेशिक भू-राजनीति, ब्रिटिश शासन के दौरान सीमाओं का निर्माण, और स्वतंत्रता के बाद एक नए राष्ट्र की रणनीतिक चुनौतियाँ—ये सभी चरण एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
इस लेख में हम भारतीय भू-राजनीति की इसी ऐतिहासिक यात्रा को क्रमबद्ध रूप से समझेंगे। प्राचीन भारत से आरंभ करके, मध्यकालीन और औपनिवेशिक युग से होते हुए, स्वतंत्रता के बाद के भारत और आधुनिक वैश्विक व्यवस्था में उसकी भूमिका तक पहुँचेंगे। उद्देश्य केवल घटनाओं का वर्णन करना नहीं, बल्कि यह समझना है कि भूगोल, इतिहास और राजनीति ने मिलकर भारत को आज की उभरती वैश्विक शक्ति कैसे बनाया।
प्राचीन भारत की भू-राजनीति: (1500–600 ईसा पूर्व)
प्राचीन भारत की भू-राजनीति को समझे बिना Indian Geopolitics की जड़ों को समझना संभव नहीं है। यह वह काल था जब भारत केवल एक सांस्कृतिक सभ्यता नहीं, बल्कि एशिया, अफ्रीका और यूरोप को जोड़ने वाला एक रणनीतिक केंद्र था।
भारत की भौगोलिक स्थिति और प्राचीन व्यापार मार्ग: (1500–600 ईसा पूर्व)
भारत की भौगोलिक स्थिति ने इसे स्वाभाविक रूप से एक भू-राजनीतिक शक्ति बना दिया। उत्तर में हिमालय ने जहाँ सुरक्षा प्रदान की, वहीं खैबर और बोलान जैसे दर्रों ने मध्य एशिया से संपर्क बनाए रखा। ये मार्ग केवल आक्रमण के रास्ते नहीं थे, बल्कि व्यापार, संस्कृति और कूटनीति के भी माध्यम थे।
दक्षिण में विस्तृत समुद्री तट और हिंद महासागर ने भारत को समुद्री व्यापार की महाशक्ति बनाया। प्राचीन भारत के व्यापारी अरब, रोमन साम्राज्य और दक्षिण-पूर्व एशिया तक व्यापार करते थे। मसाले, वस्त्र, कीमती पत्थर और ज्ञान—भारत से दुनिया तक पहुँचते थे। यह आर्थिक और बौद्धिक शक्ति ही भारत की राजनीतिक अहमियत की नींव बनी।
मौर्य साम्राज्य और चाणक्य की रणनीतिक सोच: (322–185 ईसा पूर्व)
यदि प्राचीन Indian Geopolitics का कोई संगठित रूप दिखाई देता है, तो वह मौर्य साम्राज्य के काल में मिलता है। चंद्रगुप्त मौर्य और सम्राट अशोक के शासन में भारत एक केंद्रीकृत और रणनीतिक रूप से जागरूक राज्य बन चुका था। इस सोच के पीछे सबसे बड़ा नाम था—चाणक्य (कौटिल्य)।
चाणक्य का अर्थशास्त्र केवल प्रशासनिक ग्रंथ नहीं, बल्कि प्राचीन भारत का भू-राजनीतिक मैनुअल था। उसमें मंडल सिद्धांत, पड़ोसी राज्यों के साथ व्यवहार, मित्र-शत्रु की पहचान, और शक्ति संतुलन की स्पष्ट अवधारणा मिलती है। यह दिखाता है कि प्राचीन भारत में Indian Geopolitics केवल युद्ध तक सीमित नहीं थी, बल्कि कूटनीति, जासूसी और आर्थिक नीति का समन्वय थी।
समुद्री व्यापार, सिल्क रूट और हिंद महासागर में भारत का प्रभाव: (200 ईसा पूर्व – 300 ईस्वी)
प्राचीन काल में Indian Geopolitics के दृष्टिकोण से भारत की शक्ति का एक बड़ा आधार उसका समुद्री वर्चस्व था। हिंद महासागर के व्यापारिक मार्गों पर भारतीय नाविकों और व्यापारियों की मजबूत पकड़ थी। मानसून की हवाओं की समझ ने भारतीयों को समुद्री व्यापार में बढ़त दी और उन्हें एशिया-यूरोप के व्यापार नेटवर्क में प्रमुख भूमिका दिलाई।
लगभग 200 ईसा पूर्व से 300 ईस्वी तक, सिल्क रूट के माध्यम से भारत का संपर्क चीन, मध्य एशिया और यूरोप तक था। इस व्यापारिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान ने Indian Geopolitics को स्थायित्व और प्रभावशीलता प्रदान की। यह केवल वस्तुओं का आदान-प्रदान नहीं था, बल्कि विचारों, धर्म और तकनीक का भी प्रवाह था। बौद्ध धर्म का एशिया में प्रसार भी इसी भू-राजनीतिक नेटवर्क का परिणाम था।
मध्यकालीन भारत और शक्ति संतुलन: (600–1700 ईस्वी)
Indian Geopolitics के दृष्टिकोण से मध्यकालीन भारत का काल महत्वपूर्ण था, जब नए साम्राज्य उभरे, सीमा प्रबंधन की चुनौतियाँ बढ़ीं और भारत का अंतरराष्ट्रीय संबंध विस्तार की ओर बढ़ा।
Delhi Sultanate और सेंट्रल एशिया से संपर्क: (1206–1526 ईस्वी)
1206–1526 ईस्वी के दौरान दिल्ली सल्तनत ने भारत को Central Asia के व्यापार और राजनीतिक नेटवर्क से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस काल में सल्तनत की Indian Geopolitics की रणनीति मुख्यतः तीन स्तंभों पर आधारित थी: सीमाओं की सुरक्षा, पड़ोसी राज्यों के साथ शक्ति संतुलन, और व्यापारिक नेटवर्क का नियंत्रण।
उदाहरण के लिए, खिलजी वंश ने लगातार उत्तर-पश्चिमी सीमाओं पर सैन्य अभियान चलाकर अफगान और तुर्की साम्राज्यों के साथ संतुलन बनाए रखा। इसी दौरान तुगलक वंश ने दूरदराज के क्षेत्रों में प्रशासनिक सुधार और सेना की संगठित व्यवस्था के माध्यम से सल्तनत की स्थिरता सुनिश्चित की। इसके साथ ही, लोधी वंश ने व्यापार मार्गों और कूटनीतिक संपर्कों को मजबूत कर भारत को मध्य एशिया और फारस से जुड़े रहने में मदद की।
सिर्फ युद्ध ही नहीं, बल्कि आर्थिक और सांस्कृतिक संपर्क भी दिल्ली सल्तनत की रणनीति का अहम हिस्सा थे। उदाहरण के लिए, सिंध और पंजाब के व्यापारिक मार्गों के जरिए मसाले, वस्त्र और धन मध्य एशिया के कारवां मार्गों तक पहुँचते थे। इस तरह के नेटवर्क ने सल्तनत को न केवल स्थानीय बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी Indian Geopolitics में प्रभावशाली बनाया।
इस दौर की रणनीति आज के दृष्टिकोण से देखी जाए तो यह स्पष्ट है कि दिल्ली सल्तनत ने सीमाओं की सुरक्षा, पड़ोसी राज्यों के साथ संतुलन और वैश्विक व्यापार के संयोजन से एक शुरुआती Geopolitical Model स्थापित किया। यही आधार भारत के भविष्य की भू-राजनीतिक सोच और आधुनिक Indian Geopolitics का प्रारंभिक ढांचा बनता है।
मुगल साम्राज्य और फ्रंटियर प्रबंधन: (1526–1707 ईस्वी)
1526–1707 ईस्वी के दौरान मुगल साम्राज्य ने भारत को केंद्रीकृत करने के साथ-साथ अपने फ्रंटियर क्षेत्रों और सीमाओं का सुव्यवस्थित प्रबंधन किया। इस काल में Indian Geopolitics का केंद्रबिंदु था—सैन्य शक्ति, प्रशासनिक संगठन और पड़ोसी राज्यों के साथ संतुलन।
उदाहरण के लिए, बाबर ने पानीपत की पहली लड़ाई (1526) में अफगान साम्राज्यों को पराजित कर उत्तर भारत में मुगल प्रभुत्व स्थापित किया। इसके बाद अकबर ने राजपूतों के साथ विवाह और कूटनीतिक समझौते कर फ्रंटियर क्षेत्रों में स्थायित्व लाया। दक्षिण और पश्चिमी सीमाओं पर अफगानों और आदिवासी रियासतों के साथ किए गए सैन्य अभियानों ने सामरिक संतुलन बनाए रखा।
मुगलों ने न केवल युद्ध के माध्यम से बल्कि प्रशासनिक नवाचारों के जरिए भी सीमाओं को नियंत्रित किया। जैसे अकबर के सैन्य संगठन — मनसबदारी प्रणाली और शाही गुप्तचर नेटवर्क ने राज्य को स्थिर और शक्तिशाली बनाया।
इसके अलावा, मुगल साम्राज्य ने व्यापार मार्गों और समुद्री संपर्कों पर भी ध्यान दिया। सिंध और गुजरात के बंदरगाहों के माध्यम से भारतीय वस्त्र, मसाले और धातु यूरोप और मध्य एशिया तक पहुँचे। यह रणनीति साफ दिखाती है कि मुगल साम्राज्य की Indian Geopolitics केवल आंतरिक शक्ति पर आधारित नहीं थी, बल्कि वैश्विक संपर्क और आर्थिक प्रभुत्व पर भी केंद्रित थी।
अफगानों, फारसियों और यूरोपियों का प्रवेश: (1000–1700 ईस्वी)
लगभग 1000–1700 ईस्वी के दौरान भारत में अफगानों और फारसियों के कई प्रवेश हुए, जिससे राजनीतिक और सामरिक चुनौतियाँ बढ़ीं। इसके अलावा, यूरोपीय व्यापारियों और नाविकों का आगमन, विशेषकर पुर्तगालियों और डचों का, भारतीय समुद्री व्यापार और राजनैतिक संतुलन को प्रभावित करता रहा।
यह दौर Indian Geopolitics में वैश्विक संपर्क और शक्ति संघर्ष का प्रतीक बन गया। उदाहरण के लिए, पुर्तगाली नाविकों और वास्को डा गामा की यात्राओं ने भारतीय तटों को वैश्विक व्यापार नेटवर्क से जोड़ दिया। इसी संदर्भ में आप Age of Discovery (15वीं–17वीं सदी) की कहानी पढ़ सकते हैं, जिसने समूचे यूरोप और एशिया के व्यापारिक और राजनैतिक परिदृश्य को बदल दिया।
इस प्रकार, अफगानों, फारसियों और यूरोपियों के प्रवेश ने भारत की भू-राजनीतिक स्थिति को नई दिशा दी और Indian Geopolitics में पहले से भी अधिक जटिलता और रणनीतिक महत्व जोड़ा।
भारत में यूरोपीय प्रवेश और Colonial Geopolitics:
इस काल (लगभग 15वीं–19वीं सदी) में भारत में यूरोपीय शक्तियों का आगमन Indian Geopolitics की दिशा बदलने वाला था। पुर्तगालियों, डचों, फ्रांसीसियों और बाद में ब्रिटिशों का प्रवेश न केवल व्यापारिक दृष्टिकोण से बल्कि राजनीतिक और सामरिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण साबित हुआ।
यह दौर भारतीय भू-राजनीति में वैश्विक संपर्क, समुद्री शक्ति, और औपनिवेशिक हस्तक्षेप का प्रारंभिक चरण था।
Age of Discovery का भारत पर प्रभाव: (15वीं–17वीं सदी)
Indian Geopolitics के दृष्टिकोण से 15वीं–17वीं सदी का Age of Discovery भारत के लिए निर्णायक दौर था। इस समय यूरोपीय नाविकों और खोजकर्ताओं ने समुद्री मार्ग खोजे और भारत के साथ व्यापारिक संपर्क स्थापित करना शुरू किया, जिससे भारतीय भू-राजनीति और अर्थव्यवस्था पर स्थायी प्रभाव पड़ा।
उदाहरण के लिए, 1498 में वास्को डा गामा का भारत आगमन न केवल व्यापार के नए मार्ग खोलने वाला था, बल्कि यह हिंद महासागर में भारतीय व्यापारिक नेटवर्क को यूरोप से जोड़ने वाला पहला बड़ा कदम था। इसके बाद पुर्तगाल, डच और फ्रांसीसी नाविकों का आगमन भारत के तटों और बंदरगाहों को वैश्विक व्यापारिक परिदृश्य में शामिल कर गया।
इस दौर ने भारत को केवल वस्तुओं के आदान-प्रदान तक ही सीमित नहीं रखा। भारत के मसाले, वस्त्र और कीमती धातुएँ यूरोप तक तो पहुँची ही, साथ ही साथ Indian Geopolitics में अंतरराष्ट्रीय संपर्क और सामरिक समझ का भी विकास हुआ।
East India Company ー व्यापार से राज्य तक: (17वीं–18वीं सदी)
17वीं–18वीं सदी में East India Company ने केवल व्यापार के लिए ही नहीं, बल्कि भारत में राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करने के लिए भी कदम बढ़ाए। कंपनी ने बंगाल, मद्रास और बंबई में मजबूत व्यापारिक किले बनाए और धीरे-धीरे स्थानीय रियासतों के साथ समझौते करके अपनी शक्ति बढ़ाई। इसने भारत में Indian Geopolitics को एक नई दिशा दी।
उदाहरण के लिए:
- बंगाल का व्यापारिक नियंत्रण – कंपनी ने बंगाल के प्रमुख बंदरगाह और बाजार अपने नियंत्रण में ले लिए, जिससे वस्तुओं का आदान-प्रदान और राजस्व की निगरानी सीधे उसके हाथ में चली गई।
- राजनैतिक समझौते और सीमाओं का संरक्षण – स्थानीय रियासतों और नवाबों के साथ किए गए समझौते और कभी-कभी सैन्य हस्तक्षेप ने कंपनी को केवल व्यापारी नहीं, बल्कि शक्तिशाली राजनीतिक खिलाड़ी बना दिया।
इस पूरी प्रक्रिया ने स्पष्ट किया कि व्यापार और राजनीतिक नियंत्रण अलग नहीं थे। Colonial Expansion(17वीं–18वीं सदी) के माध्यम से आप विस्तार से जान सकते हैं कि कैसे व्यापारिक प्रभुत्व ने धीरे-धीरे Indian Geopolitics और सत्ता की संरचना को बदल दिया।
यूरोप की विस्तारवादी नीति अचानक पैदा नहीं हुई थी। इसकी वैचारिक नींव French Revolution (1789) और Napoleon Bonaparte के उदय से पड़ी, जिसने राज्य, शक्ति और राष्ट्रवाद की नई परिभाषा गढ़ी।
Napoleon की हार के बाद यूरोप ने युद्ध रोकने और शक्ति-संतुलन बनाए रखने के लिए Congress of Vienna (1815) और बाद में Concert of Europe (1815–1850) जैसी व्यवस्थाएँ खड़ी कीं। यही सोच आगे चलकर औपनिवेशिक Geopolitics में भी दिखती है।
Industrial Revolution और Colonial Exploitation: (18वीं–19वीं सदी)
18वीं–19वीं सदी में Industrial Revolution ने यूरोप को आर्थिक और सैन्य शक्ति प्रदान की, जिसका सीधा प्रभाव भारत पर पड़ा। इस दौर में भारत के संसाधनों और व्यापारिक नेटवर्क पर यूरोपीय शक्तियों का प्रभाव बढ़ा, जिससे Indian Geopolitics में औपनिवेशिक प्रभुत्व और वैश्विक शक्ति संतुलन को नया आकार मिला।
Industrial Revolution के भारत पर पड़ने वाले मुख्य प्रभाव:
- अंग्रेज भारत से सस्ता कच्चा माल (कपास, जूट, नील) ले जाकर इंग्लैंड में महँगा तैयार माल बनाते थे और वही भारत में बेचते थे।
- भारतीय हस्तशिल्प और बुनकर उद्योग को जानबूझकर नष्ट कर दिया गया।
- किसानों को जबरन नील की खेती करने के लिए मजबूर किया गया, चाहे उन्हें घाटा ही क्यों न हो।
- नील की कीमत अंग्रेज तय करते थे, जिससे किसानों को उनकी मेहनत का उचित मूल्य नहीं मिलता था।
- स्थायी बंदोबस्त व्यवस्था ने जमींदारों को शक्तिशाली और किसानों को कर्ज का गुलाम बना दिया।
- रेलमार्गों का निर्माण भारत के विकास के लिए नहीं, बल्कि कच्चा माल बंदरगाहों तक पहुँचाने के लिए किया गया।
- भारत को ब्रिटिश कारखानों का बाजार बना दिया गया।
- भारतीय उद्योगों पर भारी कर और ब्रिटिश माल पर छूट — यह खुला आर्थिक भेदभाव था।
- इस शोषण का परिणाम भुखमरी, अत्यधिक गरीबी और भीषण अकाल के रूप में सामने आया।
British Raj और भारतीय सीमाओं का निर्माण: (19वीं–20वीं सदी)
Indian Geopolitics के इतिहास में ब्रिटिश राज वह दौर था जब भारत की आधुनिक सीमाओं की नींव रखी गई। यह केवल प्रशासनिक सुविधा का मामला नहीं था, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य की सुरक्षा, विस्तार और वैश्विक शक्ति संतुलन से जुड़ा हुआ एक गहरा भू-राजनीतिक प्रोजेक्ट था।
उन्नीसवीं और बीसवीं सदी की शुरुआत में लिए गए कई फैसले आज भी भारत की विदेश नीति और सीमा विवादों को प्रभावित करते हैं।
आधुनिक सीमाओं का निर्माण: (19वीं सदी)
ब्रिटिश शासन के दौरान भारत की सीमाएँ पहली बार आधुनिक मानचित्रों और राजनीतिक जरूरतों के अनुसार तय की गईं। इससे पहले सीमाएँ अधिकतर सांस्कृतिक, प्राकृतिक या साम्राज्यिक प्रभाव क्षेत्रों पर आधारित थीं।
उदाहरण के लिए:
- Durand Line (1893) ने भारत (तत्कालीन ब्रिटिश भारत) और अफगानिस्तान के बीच एक कृत्रिम सीमा खींची।
- McMahon Line (1914) के जरिए उत्तर-पूर्वी भारत और तिब्बत के बीच सीमा तय करने की कोशिश की गई।
इन सीमाओं का उद्देश्य स्थानीय हित नहीं, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य की रणनीतिक सुरक्षा था। यही कारण है कि स्वतंत्र भारत के समय कई सीमा विवाद विरासत में मिले, जो आज की Indian Geopolitics का अहम हिस्सा हैं।
अफगानिस्तान, तिब्बत और बर्मा का भू-राजनीतिक महत्व:
ब्रिटिश रणनीति में भारत के पड़ोसी क्षेत्र Buffer Zones की तरह देखे जाते थे।
- अफगानिस्तान को रूस और भारत के बीच एक सुरक्षा कवच माना गया।
- तिब्बत को चीन और ब्रिटिश भारत के बीच एक रणनीतिक क्षेत्र के रूप में देखा गया।
- बर्मा (म्यांमार) को दक्षिण-पूर्व एशिया में ब्रिटिश प्रभाव बढ़ाने का प्रवेश द्वार बनाया गया।
इन क्षेत्रों में ब्रिटिश हस्तक्षेप सीधे तौर पर भारत की सुरक्षा और साम्राज्य की स्थिरता से जुड़ा था। यह दर्शाता है कि Indian Geopolitics केवल उपमहाद्वीप तक सीमित नहीं थी, बल्कि एशिया की व्यापक रणनीति का हिस्सा थी।
Great Game और रूस–ब्रिटेन प्रतिद्वंद्विता: (19वीं सदी)
Great Game उन्नीसवीं सदी में रूस और ब्रिटेन के बीच मध्य एशिया में चला एक भू-राजनीतिक संघर्ष था, जिसका सीधा प्रभाव भारत पर पड़ा। ब्रिटेन को डर था कि रूस मध्य एशिया के रास्ते भारत तक पहुँच सकता है।
इस डर के कारण:
- सीमाओं को आक्रामक रूप से सुरक्षित किया गया।
- अफगा न युद्ध लड़े गए।
- भारत को ब्रिटिश साम्राज्य की “Crown Jewel” के रूप में संरक्षित किया गया।
यह प्रतिस्पर्धा बताती है कि भारत केवल एक उपनिवेश ही नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संघर्ष का केंद्र भी था। यही विरासत आगे चलकर आधुनिक Indian Geopolitics की आधारशिला बनी।
1947: विभाजन और नई Indian Geopolitics
1947 में भारत की स्वतंत्रता के साथ ही Indian Geopolitics एक नए और जटिल दौर में प्रवेश करती है। ब्रिटिश राज की समाप्ति ने भारत को राजनीतिक आजादी दी, लेकिन साथ ही विभाजन, अस्थिर सीमाएँ और नए पड़ोसी देशों के साथ तनाव भी विरासत में मिला। यह वह क्षण था जब भारत को पहली बार अपनी स्वतंत्र भू-राजनीतिक पहचान खुद गढ़नी पड़ी।
विभाजन का भू-राजनीतिक प्रभाव (1947):
भारत का विभाजन केवल एक राजनीतिक घटना नहीं थी, बल्कि इसका सीधा प्रभाव उपमहाद्वीप के शक्ति संतुलन, सीमाओं और सुरक्षा ढांचे पर पड़ा।
- भारत और पाकिस्तान का निर्माण दो विरोधी रणनीतिक दृष्टिकोणों के साथ हुआ
- लाखों लोगों का विस्थापन हुआ, जिससे आंतरिक स्थिरता पर असर पड़ा
- कई रियासतों को भारत या पाकिस्तान में शामिल होने का निर्णय लेना पड़ा
Indian Geopolitics के संदर्भ में विभाजन ने स्थायी तनाव की स्थिति पैदा कर दी, जो आगे चलकर युद्धों, सीमा विवादों और कूटनीतिक संघर्षों में बदल गई।
कश्मीर, पाकिस्तान और चीन फैक्टर:
स्वतंत्रता के तुरंत बाद भारत की भू-राजनीति तीन बड़े आयामों से घिर गई:
कश्मीर मुद्दा (1947–48):
जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय और उसके बाद पहला भारत–पाक युद्ध, भारतीय सुरक्षा नीति का केंद्र बन गया। यह विवाद आज भी दक्षिण एशिया की Geopolitics को प्रभावित करता है।
पाकिस्तान फैक्टर:
1947, 1965 और 1971 के युद्धों ने भारत–पाक संबंधों को स्थायी प्रतिस्पर्धा में बदल दिया। पाकिस्तान की रणनीति अक्सर भारत को असंतुलित करने और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दबाव बनाने पर केंद्रित रही।
चीन फैक्टर (1950 के बाद):
1950 में तिब्बत पर चीन का नियंत्रण और 1962 का भारत–चीन युद्ध, भारत की उत्तरी सीमाओं की संवेदनशीलता को उजागर करता है। इसके बाद चीन, Indian Geopolitics का स्थायी और जटिल तत्व बन गया।
NAM और भारत की स्वतंत्र विदेश नीति:
Cold War (1947–1991) के दौर में भारत ने खुद को अमेरिका और सोवियत संघ के सैन्य गुटों से दूर रखने की नीति अपनाई। जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में भारत ने Non-Aligned Movement (NAM) को अपनाया।
NAM का उद्देश्य था:
- रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखना
- नव-स्वतंत्र देशों के साथ एकजुटता
- वैश्विक राजनीति में स्वतंत्र आवाज बनना
हालाँकि आलोचकों ने इसे आदर्शवादी कहा, लेकिन NAM ने भारत को एक अलग पहचान दी और Indian Geopolitics में “Strategic Autonomy” की अवधारणा को मजबूत किया।
Cold War युग और भारत (1947–1991):
Cold War के दौर में Indian Geopolitics की सबसे बड़ी चुनौती थी — दो वैश्विक ध्रुवों, USA और USSR, के बीच अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखना। यह वह समय था जब भारत न केवल क्षेत्रीय युद्धों से जूझ रहा था, बल्कि वैश्विक शक्ति-संतुलन में अपनी जगह भी तलाश रहा था।
USA–USSR के बीच भारत की रणनीतिक स्थिति:
Cold War के दौरान भारत ने औपचारिक रूप से किसी भी सैन्य गुट का हिस्सा न बनने का निर्णय लिया। Non-Aligned Movement (NAM) के माध्यम से भारत ने यह संदेश दिया कि उसकी विदेश नीति राष्ट्रीय हितों पर आधारित होगी, न कि किसी महाशक्ति की छत्रछाया मेंचलेगी।
इस दौरान भारत ने ये कदम उठाए:
- USSR के साथ रक्षा, ऊर्जा और कूटनीतिक सहयोग
- USA के साथ सीमित लेकिन व्यावहारिक संबंध
- रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) पर जोर
यही संतुलन Indian Geopolitics की पहचान बन गया।
1962, 1965 और 1971 के युद्ध: भू-राजनीतिक मोड़
1962 – भारत–चीन युद्ध:
चीन के साथ युद्ध ने भारत की सुरक्षा नीति की कमजोरियों को उजागर किया। इसके बाद भारत ने सेना के आधुनिकीकरण और सीमा सुरक्षा पर गंभीर ध्यान देना शुरू किया। हालाँकि 2025 में रूस ने भारत-चीन रिश्तों में सुधार का प्रयास किया था जिससे दोनों देशों के बीच तनाव में कमी देखने को मिली थी।
1965 – भारत–पाक युद्ध:
इस युद्ध ने स्पष्ट कर दिया कि पाकिस्तान Indian Geopolitics में भारत का स्थायी प्रतिद्वंद्वी रहेगा। Cold War की वैश्विक राजनीति ने इस संघर्ष को अंतरराष्ट्रीय आयाम भी दिया।
1971 – भारत–पाक युद्ध और बांग्लादेश का उदय:
1971 का युद्ध Indian Geopolitics का सबसे निर्णायक क्षण माना जाता है। इसमें:
- भारत–USSR Friendship Treaty (1971) पर हस्ताक्षर किए गए
- पाकिस्तान का विभाजन और बांग्लादेश का निर्माण हुआ
- दक्षिण एशिया में भारत का निर्णायक वर्चस्व दिखाई दिया
बांग्लादेश का उदय और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन:
1971 में बांग्लादेश के स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में उभरने से दक्षिण एशिया का भू-राजनीतिक मानचित्र बदल गया। भारत ने न केवल मानवीय संकट का समाधान किया, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता में निर्णायक भूमिका निभाई।
इस घटना ने भारत को एक Regional Power के रूप में स्थापित किया और यह साबित किया कि Indian Geopolitics अब केवल प्रतिक्रिया देने वाली नहीं, बल्कि दिशा तय करने वाली शक्ति बन चुकी थी।
Post–Cold War युग और आधुनिक भारत (1991–वर्तमान):
Cold War की समाप्ति (1991) के बाद Indian Geopolitics ने एक निर्णायक मोड़ लिया। वैश्विक शक्ति-संरचना के बदलते ही भारत ने भी अपनी रणनीति, अर्थव्यवस्था और विदेश नीति को नए सिरे से परिभाषित किया। यह दौर भारत के एक “Defensive State” से Assertive और Global-Facing Power बनने की शुरुआत था।
1991 के बाद भारत की रणनीतिक दिशा में बदलाव:
1991 का आर्थिक उदारीकरण केवल आर्थिक सुधार नहीं था, बल्कि इसका सीधा प्रभाव Indian Geopolitics पर पड़ा।
- वैश्विक बाजारों से जुड़ाव
- अमेरिका, यूरोप और पूर्वी एशिया के साथ रिश्तों में सुधार
- रूस के साथ पारंपरिक सहयोग को बनाए रखना
भारत ने अब Multi-Alignment की नीति अपनाई — यानी एक साथ कई शक्तियों से संबंध, बिना किसी एक गुट में बंधे।
Indo-Pacific, QUAD, BRICS और चीन की चुनौती:
21वीं सदी में भारत की Indian Geopolitics का केंद्र धीरे-धीरे Indo-Pacific क्षेत्र बन गया है। इसका सबसे बड़ा कारण है चीन का तेज और आक्रामक उदय—चाहे वह सीमाओं पर हो या समुद्री मार्गों पर।
- चीन के साथ सीमा तनाव – Doklam (2017) और Galwan (2020) जैसी घटनाओं ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) की संवेदनशीलता उजागर की।
- हिंद महासागर में बढ़ती चीनी उपस्थिति – बंदरगाह परियोजनाएँ और नौसैनिक गतिविधियाँ भारत की समुद्री सुरक्षा के लिए चुनौती बनीं।
- समुद्री मार्ग और सप्लाई चेन की सुरक्षा – वैश्विक व्यापार का बड़ा हिस्सा Indo-Pacific से होकर गुजरता है, जहाँ भारत की स्थिरता निर्णायक है।
इन चुनौतियों के जवाब में भारत ने दोहरी रणनीति अपनाई:
- QUAD (India–USA–Japan–Australia) के माध्यम से समुद्री सुरक्षा, मुक्त Indo-Pacific और नियम-आधारित व्यवस्था को समर्थन दिया।
- BRICS (Brazil–Russia–India–China–South Africa) जैसे मंचों पर चीन के साथ संवाद बनाए रखते हुए, वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक सुधारों की पैरवी की।
इसके साथ-साथ भारत ने:
- नौसैनिक शक्ति और समुद्री कूटनीति को मजबूत किया
- ASEAN और अन्य Indo-Pacific देशों के साथ साझेदारी बढ़ाई
यह सब दर्शाता है कि Indian Geopolitics अब किसी एक गुट तक सीमित नहीं है, बल्कि संतुलन, संवाद और शक्ति — तीनों को साधने की कोशिश कर रही है।
उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में भारत:
आज भारत को एक Emerging Global Power के रूप में देखा जाता है:
- दुनिया की सबसे बड़ी आबादी
- तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था
- तकनीक, अंतरिक्ष और रक्षा में आत्मनिर्भरता
- G20, BRICS और SCO जैसे मंचों पर प्रभावशाली भूमिका
आधुनिक Indian Geopolitics अब केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि कूटनीति, अर्थव्यवस्था, तकनीक और वैचारिक प्रभाव का समन्वय बन चुकी है।
Indian Geopolitics केवल सीमाओं, युद्धों या कूटनीतिक समझौतों की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस निरंतर प्रक्रिया का परिणाम है जिसमें भूगोल, इतिहास, शक्ति और विचारधारा एक-दूसरे से टकराते और जुड़ते रहे हैं। प्राचीन भारत के व्यापारिक मार्गों और साम्राज्यवादी सोच से लेकर औपनिवेशिक शोषण, विभाजन की पीड़ा, Cold War की चुनौतियाँ और आज के Indo-Pacific समीकरण—हर दौर ने भारत की भू-राजनीतिक चेतना को आकार दिया है।
इतिहास हमें यह सिखाता है कि भारत कभी भी वैश्विक राजनीति से अलग-थलग नहीं रहा। मौर्य काल की रणनीतिक समझ, मुगल काल का फ्रंटियर प्रबंधन, ब्रिटिश काल में सीमाओं का कृत्रिम निर्माण और स्वतंत्रता के बाद की रणनीतिक स्वायत्तता — ये सभी चरण मिलकर Indian Geopolitics की मजबूत नींव बनाते हैं। यही कारण है कि आज की भारतीय विदेश नीति को समझने के लिए अतीत को जानना अनिवार्य है।
21वीं सदी में भारत की भू-राजनीति एक नए चरण में प्रवेश कर चुकी है। Indo-Pacific, QUAD, BRICS, G-20, तकनीकी शक्ति, आर्थिक कूटनीति और बहुध्रुवीय विश्व — ये सभी संकेत देते हैं कि भारत अब केवल प्रतिक्रिया देने वाला देश नहीं, बल्कि वैश्विक संतुलन को प्रभावित करने वाली शक्ति बन रहा है।
भारत की रणनीति न तो किसी एक गुट में बंधने की है और न ही टकराव को प्राथमिकता देने की—बल्कि संतुलन, संवाद और राष्ट्रीय हित को केंद्र में रखने की है।
आगे का रास्ता चुनौतियों से भरा है—चीन के साथ प्रतिस्पर्धा, पड़ोसी देशों के साथ संबंध, वैश्विक अर्थव्यवस्था की अनिश्चितता और तकनीकी बदलाव। इसके साथ ही NATO जैसे सैन्य गठबंधनों की बढ़ती भूमिका और अमेरिका-यूरोप केंद्रित सुरक्षा ढांचे, भारत के लिए एक जटिल वैश्विक परिदृश्य तैयार करते हैं। लेकिन इतिहास गवाह है कि भारत ने हर युग में खुद को परिस्थितियों के अनुसार ढाला है। यही अनुकूलन क्षमता भविष्य में भी Indian Geopolitics को दिशा देगी।
अंततः, भारतीय भू-राजनीति को समझना केवल अतीत की यात्रा नहीं, बल्कि आने वाले समय की तैयारी भी है। क्योंकि जो राष्ट्र अपने इतिहास को समझता है, वही भविष्य में अपनी भूमिका खुद तय करता है।