BRICS और BHARAT: बदलती दुनिया का शक्ति संतुलन।

आज की वैश्विक राजनीति में BRICS सिर्फ एक संगठन नहीं, बल्कि उभरती हुई शक्तियों की आवाज है। अमेरिका और पश्चिमी देशों के दबदबे के बीच, BRICS का विस्तार एक नए बहुध्रुवीय(Multipolar) विश्व की नींव रख रहा है। ऐसे माहौल में भारत की भूमिका और भी अहम हो जाती है क्योंकि Bharat, BRICS का एक प्रमुख सदस्य देश है, और यह सफर हमारे लिए नए मौके, गंभीर चुनौतियाँ, और अनगिनत संभावनाएँ लेकर आया है।

BRICS का इतिहास:

BRICS का आरंभ 2009 में हुआ था, जब चार उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं ब्राजील, रूस, भारत और चीन ने वैश्विक, आर्थिक और राजनीतिक मंच पर अपनी आवाज को मजबूत करने के लिए एक गठबंधन बनाया। शुरू में इसे BRIC कहा जाता था, और इसका मुख्य उद्देश्य था विश्व में विकसित देशों के दबदबे को चुनौती देना और विकासशील देशों की संभावनाओं को बढ़ावा देना।

2010 में दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने के बाद यह BRICS बन गया। तब से यह समूह हर साल सम्मेलनों और शिखर बैठकों के माध्यम से अपने प्रभाव और सहयोग को मजबूत करता रहा है, और धीरे-धीरे वैश्विक राजनीति में एक महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभरने लगा है।

BRICS के पांच देशों के नेता भारत, चीन, रूस, ब्राज़ील और दक्षिण अफ्रीका एक साथ हाथ मिलाते हुए।
भारत, चीन, रूस, ब्राज़ील और दक्षिण अफ्रीका के नेता एक साथ शिखर सम्मेलन में।

BRICS का विस्तार:

BRICS अब केवल चार देशों का गठबंधन नहीं रह गया है, यह धीरे-धीरे Global South की आवाज बनता जा रहा है। हाल के वर्षों में सऊदी अरब, UAE, ईरान, मिस्र, इथियोपिया और इंडोनेशिया जैसे देश इस समूह में शामिल हुए हैं। इसका मकसद है वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक शक्ति के संतुलन को बदलना, ताकि विकासशील देश भी वैश्विक निर्णयों में समान भागीदार बन सकें।

कार्य प्रणाली (Working Mechanism):

BRICS एक समानतावादी(Consensus-based) संगठन है, जहाँ सभी सदस्य देशों के विचार और हितों का सम्मान किया जाता है। कोई भी निर्णय तब तक लागू नहीं होता जब तक सभी सदस्य देश उस पर सहमत न हों। समूह के मुख्य कार्यों में वार्षिक शिखर सम्मेलन (Summit Meetings), मंत्रियों और अधिकारियों की नियमित बैठकें, और विशेष क्षेत्रों जैसे वित्त, व्यापार, तकनीक और ऊर्जा में सहयोग शामिल हैं।

इसके अलावा BRICS का अपना नव विकास बैंक (New Development Bank – NDB) है, जिसकी स्थापना 2014 में हुई और यह 2015 से पूरी तरह काम कर रहा है। इसका मुख्यालय शांगाई, चीन में स्थित है। NDB का मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों के विकास परियोजनाओं को वित्तीय सहायता प्रदान करना और इन्फ्रास्ट्रक्चर व सतत विकास (Sustainable Development) को बढ़ावा देना है। यह प्रणाली सुनिश्चित करती है कि सभी सदस्यों का योगदान और लाभ समान रूप से साझा हो, और वैश्विक निर्णयों में विकासशील देशों की आवाज मजबूत बने।

भारत की भूमिका और फायदे:

  • भारत BRICS में एक सक्रिय और रणनीतिक सदस्य के रूप में सामने आता है। यह समूह भारत को वैश्विक मंच पर अपनी आवाज मजबूत करने, व्यापार और निवेश के नए अवसरों को खोजने, और साझा विकास परियोजनाओं में भाग लेने का मौका देता है।
  • भारत का BRICS में योगदान सिर्फ आर्थिक नहीं है, यह राजनीतिक और सामरिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। उदाहरण के लिए, विकासशील देशों की चिंताओं को वैश्विक नीतियों में शामिल कराना और चीन समेत अन्य सदस्यों के साथ संतुलन बनाए रखना भारत की प्राथमिकता है।
  • भारत NDB के माध्यम से अपने विकासात्मक और इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को गति दे रहा है। NDB ने भारत में कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं को वित्तीय सहायता प्रदान की है, जिनमें Delhi-Ghaziabad-Meerut Regional Rapid Transit System (RRTS) जैसी बड़ी शहरी परिवहन परियोजनाएँ शामिल हैं। इसके अलावा  Solar Energy Projects, Smart City Initiatives, Clean Water और Waste Management Projects में भी NDB का सहयोग भारत के सतत विकास लक्ष्यों को मजबूत कर रहा है।

चुनौतियाँ (Challenges):

BRICS के विस्तार और सक्रिय होने के बावजूद, समूह को कई आंतरिक और बाहरी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

आंतरिक चुनौतियाँ (Internal Challenges):

  • आर्थिक असमानताएँ (Economic Disparities):- सदस्य देशों के बीच आर्थिक आकार और संरचना में बड़ा अंतर है। चीन की अर्थव्यवस्था सभी अन्य BRICS देशों के कुल मिलाकर भी बहुत बड़ी है, जिससे समूह में असंतुलन पैदा होता है और चिंता रहती है कि ब्लॉक मुख्य रूप से चीन के हितों की सेवा कर रहा है। इस असमानता के कारण अन्य सदस्य देशों के लिए चीन के साथ व्यापार घाटा भी बड़ा रहता है।
  • भू-राजनीतिक तनाव (Geopolitical Tensions):- सदस्य देशों के राजनीतिक सिस्टम और रणनीतिक हितों में विविधता अक्सर घर्षण और तनाव पैदा करती है। उदाहरण के लिए, भारत और चीन के बीच लंबे समय से सीमा विवाद और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा मौजूद है। 2024 के विस्तार में शामिल नए सदस्य जैसे सऊदी अरब और ईरान भी क्षेत्रीय तनाव और प्रतिद्वंद्विता लेकर आए हैं।
  • वैचारिक भिन्नताएँ (Ideological Differences):- BRICS में लोकतांत्रिक देश (भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका) और अधिकारवादी देश (चीन, रूस, ईरान) शामिल हैं, जिससे कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर सहमति बनाना कठिन हो जाता है।

बाहरी चुनौतियाँ (External Challenges):

  • अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता (Dependence on the U.S. Dollar):- स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने के प्रयासों के बावजूद, BRICS देशों की अंतरराष्ट्रीय लेनदेन में अमेरिकी डॉलर पर भारी निर्भरता बनी हुई है। वैकल्पिक मुद्रा बनाने में मैक्रोइकॉनॉमिक सामंजस्य और राष्ट्रीय मौद्रिक नीति की स्वतंत्रता जैसी जटिलताएँ आती हैं।
  • पश्चिमी शक्तियों का विरोध (Opposition from Western Powers):- अमेरिका और उसके सहयोगी अक्सर BRICS को पश्चिम विरोधी मंच मानते हैं, जो वैश्विक व्यवस्था को चुनौती देने का प्रयास कर रहा है। इसके अलावा, नए सदस्य देशों के लिए प्रतिबंध या टैरिफ जैसी आर्थिक दबाव की संभावना भी रहती है। उदाहरण के लिए, अमेरिका ने भारत और ब्राजील पर 50% तक के टैरिफ लगाए हैं, जो दुनिया में सबसे अधिक हैं। ऐसे टैरिफ्स इन देशों के व्यापार और निर्यात को प्रभावित करते हैं।

भविष्य की दिशा:

BRICS का भविष्य कई अवसर और चुनौतियों के बीच संतुलन बनाए रखने पर निर्भर करता है। नए सदस्यों के शामिल होने से समूह की भू-राजनीतिक और आर्थिक ताकत बढ़ेगी, लेकिन विविध हितों और संरचनात्मक जटिलताओं को संभालना चुनौतीपूर्ण रहेगा।

भारत के लिए यह अवसर और भी महत्वपूर्ण है। समूह के माध्यम से भारत वैश्विक मंच पर अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत कर सकता है, विकास परियोजनाओं में निवेश बढ़ा सकता है, और अन्य सदस्य देशों के साथ साझा व्यापार और तकनीकी सहयोग को आगे बढ़ा सकता है। उदाहरण के लिए, NDB द्वारा फंड किए गए Delhi-Ghaziabad-Meerut RRTS, solar energy projects और smart city initiatives जैसी परियोजनाएँ भारत के सतत विकास लक्ष्यों को समर्थन दे रही हैं।

भविष्य में, BRICS की भूमिका बहुध्रुवीय (Multipolar) विश्व व्यवस्था में और महत्वपूर्ण होती जाएगी। यदि सदस्य देश सहमतियों और संतुलन को बनाए रख सकते हैं, तो यह समूह विकासशील देशों की आर्थिक और राजनीतिक आवाज को मजबूत करने में सक्षम होगा। वहीं, आंतरिक असमानताएँ, बाहरी दबाव और डॉलर पर निर्भरता जैसी चुनौतियाँ बनी रहेंगी, जिन्हें भारत और अन्य सदस्य देशों को रणनीतिक रूप से संभालना होगा।

[यदि आप वैश्विक सुरक्षा और गठबंधनों के संदर्भ में भारत और BRICS की भूमिका को समझना चाहते हैं, तो NATO और इसके वैश्विक प्रभाव पर भी एक नजर डालना महत्वपूर्ण है। NATO, जैसा कि पश्चिमी देशों का प्रमुख सैन्य गठबंधन है, वैश्विक शक्ति संतुलन और सुरक्षा रणनीतियों पर सीधे असर डालता है, और इससे BRICS जैसे समूहों के निर्णयों और उनकी रणनीतियों को भी प्रभावित किया जाता है।]

BRICS और भारत का संबंध सिर्फ आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं है, यह वैश्विक शक्ति संतुलन और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में भारत की रणनीतिक भूमिका को भी दर्शाता है। नए सदस्यों के शामिल होने से समूह की ताकत बढ़ी है, लेकिन साथ ही भू-राजनीतिक विरोधाभास, आर्थिक असमानताएँ और बाहरी दबाव जैसी चुनौतियाँ भी सामने आई हैं। आगे बढ़ते हुए, भारत और अन्य सदस्य देशों की रणनीतिक समझ, सहयोग और सहमति-आधारित निर्णय प्रक्रिया ही यह तय करेगी कि BRICS वास्तव में एक सशक्त, प्रभावशाली और स्थायी वैश्विक गठबंधन बन पाए।

FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न) – BRICS और भारत:

Q1: ब्रिक्स क्या है?
A: ब्रिक्स  एक समूह है जो विकासशील देशों — ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के बीच आर्थिक और राजनीतिक सहयोग को बढ़ावा देता है।

Q2: ब्रिक्स में कुल कितने सदस्य देश हैं?
A: 2025 में BRICS में 11 सदस्य देश शामिल हैं, जिनमें हाल ही में सऊदी अरब, UAE, ईरान, मिस्र, इथियोपिया और इंडोनेशिया शामिल हुए हैं।

Q3: ब्रिक्स का उद्देश्य क्या है?
A: ब्रिक्स का मुख्य उद्देश्य है विकासशील देशों की आर्थिक और राजनीतिक स्थिति को मजबूत करना, वैश्विक शक्ति संतुलन को बदलना और सदस्य देशों के बीच सहयोग बढ़ाना।

Q4: ब्रिक्स का मुख्यालय कहाँ है?
A: ब्रिक्स  का कोई Formal मुख्यालय नहीं है, लेकिन New Development Bank (NDB) का मुख्यालय शांगाई, चीन में स्थित है।

Q5: BRICS में सबसे मजबूत देश कौन सा है?
A: आर्थिक दृष्टि से चीन सबसे मजबूत देश है, क्योंकि इसकी अर्थव्यवस्था सभी अन्य सदस्य देशों के कुल मिलाकर भी बड़ी है।

Q6: क्या भारत ब्रिक्स में शामिल है?
A: हाँ, भारत BRICS का Founding सदस्य है और 2009 से इसमें शामिल है।

Q7: ब्रिक्स के वर्तमान अध्यक्ष कौन हैं?
A: 2025 में BRICS की अध्यक्षता चीन कर रहा है। 2026 की अध्यक्षता भारत को मिलने की संभावना है।

Q8: ब्रिक्स की करेंसी क्या है?
A: BRICS की कोई साझा मुद्रा नहीं है, लेकिन समूह स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और डॉलर कम करने की कोशिश कर रहा है।

Q9: अगला ब्रिक्स सम्मेलन कहाँ होगा?
A: 2026 का BRICS शिखर सम्मेलन भारत में आयोजित होने की उम्मीद है।

Q10: G7 और G20 से BRICS का फर्क क्या है?

  • G7 – विकसित देशों का समूह।
  • G20 – 20 प्रमुख विकसित और विकासशील देशों का समूह।
  • BRICS – विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह, जो विशेष रूप से वैश्विक शक्ति संतुलन को चुनौती देता है।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Exit mobile version