15 अगस्त 1947 को जब भारत आजाद हुआ, तब सिर्फ एक नया राष्ट्र जन्म नहीं ले रहा था — बल्कि एक नई कूटनीतिक पहचान भी आकार ले रही थी। विभाजन की पीड़ा, सीमाओं का विवाद, आर्थिक कमजोरी और उभरता हुआ शीत युद्ध — इन सबके बीच भारत को तय करना था कि वह विश्व राजनीति में अपनी जगह कैसे बनाएगा।
भारत की विदेश नीति केवल सरकारों द्वारा लिए गए निर्णयों का इतिहास नहीं है, बल्कि यह उस सोच का प्रतिबिंब है जिसने आदर्शवाद, नैतिकता और रणनीतिक स्वायत्तता के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की। कभी गुटनिरपेक्षता के माध्यम से, कभी परमाणु परीक्षण के जरिए, और कभी बहु-संरेखण (Multi-Alignment) की नीति अपनाकर — भारत ने हर दौर में अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखने का प्रयास किया है।

1947 से अब तक भारत की विदेश नीति आदर्शवादी दृष्टिकोण से यथार्थवादी रणनीति तक का एक लंबा और जटिल सफर तय कर चुकी है। यह लेख उसी यात्रा को समझने का प्रयास है — इतिहास, सिद्धांत और बदलती वैश्विक परिस्थितियों के संदर्भ में।
नेहरू युग और आदर्शवादी कूटनीति (1947–1964):
स्वतंत्रता के बाद भारत की विदेश नीति की दिशा तय करने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी पंडित जवाहरलाल नेहरू पर थी। वे केवल प्रधानमंत्री ही नहीं, बल्कि पहले विदेश मंत्री भी थे। उनके सामने एक ऐसा विश्व था जो दो महाशक्तियों — अमेरिका और सोवियत संघ — में बंट चुका था। शीत युद्ध की शुरुआत हो चुकी थी और नए स्वतंत्र देशों पर किसी एक गुट के साथ खड़े होने का दबाव था।
लेकिन भारत की परिस्थितियाँ अलग थीं — आर्थिक कमजोरी, सीमाई विवाद और आंतरिक अस्थिरता। ऐसे समय में नेहरू ने आदर्शवाद, नैतिकता और स्वतंत्र सोच पर आधारित विदेश नीति की नींव रखी।
विभाजन के बाद की चुनौतियाँ:
कश्मीर मुद्दा:
1947 का विभाजन केवल राजनीतिक घटना नहीं थी, बल्कि उसने भारत की भू-राजनीति को स्थायी रूप से बदल दिया। जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय और उसके बाद भारत-पाकिस्तान युद्ध ने भारत की विदेश नीति को पहली परीक्षा दी। भारत ने यह मुद्दा संयुक्त राष्ट्र में उठाया — जो यह दिखाता है कि शुरुआती दौर में भारत अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं पर भरोसा करता था।
शरणार्थी संकट:
विभाजन के कारण लाखों लोग विस्थापित हुए। भारत को अपने सीमित संसाधनों के बीच मानवीय संकट का सामना करना पड़ा। यह आंतरिक अस्थिरता विदेश नीति को भी प्रभावित कर रही थी, क्योंकि सीमाई तनाव लगातार बना हुआ था।
पाकिस्तान के साथ तनाव:
पानी के बंटवारे से लेकर सीमाई झड़पों और कश्मीर विवाद तक, भारत-पाकिस्तान संबंध शुरुआत से ही अविश्वास और तनाव से घिरे रहे। विभाजन के तुरंत बाद दोनों देशों के बीच न केवल सीमा निर्धारण को लेकर मतभेद थे, बल्कि नदियों के जल वितरण पर भी गंभीर असहमति थी।
1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता से हुई सिंधु जल संधि एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक उपलब्धि थी, जिसने दोनों देशों के बीच जल बंटवारे का स्थायी ढांचा तय किया।
हालाँकि, इस समझौते के बावजूद कश्मीर मुद्दा, सीमा पर संघर्ष और राजनीतिक अविश्वास समाप्त नहीं हुआ। इसलिए यह संधि सहयोग का उदाहरण तो बनी, लेकिन व्यापक द्विपक्षीय तनाव को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकी।
गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM):
शीत युद्ध की पृष्ठभूमि:
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया दो ध्रुवों में बंट चुकी थी। एक ओर अमेरिका और उसका पूंजीवादी गुट, दूसरी ओर सोवियत संघ और उसका साम्यवादी गुट। नए स्वतंत्र देशों पर किसी एक पक्ष में खड़े होने का दबाव था।
भारत ने किसी गुट में शामिल क्यों नहीं हुआ?
नेहरू का मानना था कि भारत की विदेश नीति स्वतंत्र होनी चाहिए। किसी भी सैन्य गुट में शामिल होना भारत की संप्रभुता और निर्णय लेने की क्षमता को सीमित कर सकता था। इसी सोच से “गुटनिरपेक्षता” (Non-Alignment) की अवधारणा उभरी।
भारत का लक्ष्य था:
- वैश्विक शांति को बढ़ावा देना
- औपनिवेशिक शासन का विरोध
- स्वतंत्र नीति निर्धारण
बांडुंग सम्मेलन (1955):
इंडोनेशिया के बांडुंग में एशियाई-अफ्रीकी देशों का सम्मेलन हुआ, जिसने गुटनिरपेक्ष आंदोलन की नींव मजबूत की। भारत, मिस्र और यूगोस्लाविया इसके प्रमुख चेहरे बने। यह भारत की नैतिक नेतृत्व क्षमता का पहला वैश्विक प्रदर्शन था।
चीन और 1962 का झटका:
पंचशील सिद्धांत:
1954 में भारत और चीन के बीच पंचशील समझौता हुआ, जिसमें पाँच सिद्धांतों पर आधारित शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की बात कही गई। “हिंदी-चीनी भाई-भाई” का नारा इसी दौर का प्रतीक था।
भारत-चीन युद्ध (1962):
लेकिन 1962 का युद्ध भारत की विदेश नीति के लिए एक गहरा झटका साबित हुआ। आदर्शवादी विश्वास और वास्तविक सामरिक तैयारी के बीच का अंतर स्पष्ट हो गया। चीन के साथ संघर्ष ने भारत को अपनी सुरक्षा रणनीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया।
विदेश नीति में पहला बड़ा बदलाव:
1962 के बाद भारत ने रक्षा आधुनिकीकरण पर ध्यान देना शुरू किया। यह वह मोड़ था जहाँ आदर्शवाद के साथ-साथ यथार्थवाद (Realism) भी भारत की विदेश नीति का हिस्सा बनने लगा।
शक्ति संतुलन और रणनीतिक यथार्थवाद का दौर (1964–1991):
1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद भारत की विदेश नीति में एक मौलिक परिवर्तन शुरू हो चुका था। अब केवल नैतिक नेतृत्व या गुटनिरपेक्ष आदर्श पर्याप्त नहीं थे। क्षेत्रीय सुरक्षा, सैन्य तैयारी और शक्ति संतुलन (Balance of Power) वास्तविक प्राथमिकताएँ बन गईं।
1964 से 1991 तक का दौर भारत की विदेश नीति में यथार्थवाद (Realism) के सुदृढ़ होने का समय था।
इंदिरा गांधी और 1971 का युद्ध:
बांग्लादेश का निर्माण:
1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध भारत की विदेश नीति का निर्णायक मोड़ था। पूर्वी पाकिस्तान में राजनीतिक दमन और शरणार्थियों की भारी आमद ने भारत पर आर्थिक और सामाजिक दबाव बढ़ा दिया।
भारत ने पहले कूटनीतिक समर्थन जुटाया और फिर सैन्य हस्तक्षेप किया। इस युद्ध के परिणामस्वरूप बांग्लादेश का निर्माण हुआ। बांग्लादेश के निर्माण ने दक्षिण एशिया में भारत की स्थिति को मजबूत किया। इस संबंध के विकास को विस्तार से समझने के लिए आप भारत-बांग्लादेश संबंधों पर हमारा विस्तृत विश्लेषण पढ़ सकते हैं।
यह पहली बार था जब भारत ने स्पष्ट रूप से अपनी क्षेत्रीय शक्ति का प्रदर्शन किया और दक्षिण एशिया की शक्ति-संतुलन व्यवस्था को बदल दिया।
भारत-सोवियत संधि (1971):
युद्ध से ठीक पहले भारत ने सोवियत संघ के साथ 20 वर्षीय मैत्री और सहयोग संधि पर हस्ताक्षर किए। यह कदम दर्शाता है कि भारत भले ही औपचारिक रूप से गुटनिरपेक्ष था, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर उसने रणनीतिक साझेदारी का सहारा लिया।
यह “गुटनिरपेक्षता” से “व्यावहारिक संतुलन” की ओर बढ़ने का संकेत था।
परमाणु नीति और 1974 का पोखरण परीक्षण:
रणनीतिक स्वायत्तता की ओर कदम:
1974 में भारत ने पोखरण में अपना पहला परमाणु परीक्षण किया, जिसे “स्माइलिंग बुद्धा” नाम दिया गया।
भारत ने इसे शांतिपूर्ण परमाणु विस्फोट बताया, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे एक स्पष्ट सामरिक संदेश के रूप में देखा गया। इस परीक्षण के माध्यम से भारत ने यह संकेत दिया कि वह अपनी सुरक्षा आवश्यकताओं के लिए बाहरी शक्तियों पर निर्भर नहीं रहेगा।
यहीं से “रणनीतिक स्वायत्तता” (Strategic Autonomy) भारत की विदेश नीति का स्थायी सिद्धांत बनना शुरू हुआ।
क्षेत्रीय शक्ति के रूप में भारत:
1970 और 1980 के दशक में भारत ने दक्षिण एशिया में अपनी भूमिका को और स्पष्ट किया।
श्रीलंका हस्तक्षेप (IPKF):
1987 में भारत ने श्रीलंका में शांति सेना (IPKF) भेजी। उद्देश्य था गृहयुद्ध को नियंत्रित करना और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखना।
हालाँकि यह मिशन जटिल और विवादास्पद साबित हुआ, लेकिन इससे यह स्पष्ट हुआ कि भारत अपने पड़ोस में सक्रिय भूमिका निभाने को तैयार है।
मालदीव – ऑपरेशन कैक्टस (1988):
1988 में मालदीव में तख्तापलट की कोशिश को भारत ने कुछ ही घंटों में विफल कर दिया। यह तेज और निर्णायक सैन्य कार्रवाई भारत की क्षेत्रीय प्रतिक्रिया क्षमता का प्रदर्शन थी। इस घटना ने यह स्थापित किया कि दक्षिण एशिया में भारत सुरक्षा प्रदाता (Security Provider) की भूमिका निभा सकता है।
1964 से 1991 तक का दौर भारत की विदेश नीति में आदर्शवाद और यथार्थवाद के संतुलन का समय था। गुटनिरपेक्षता औपचारिक रूप से बनी रही, लेकिन व्यवहार में भारत ने शक्ति संतुलन, परमाणु क्षमता और क्षेत्रीय नेतृत्व को प्राथमिकता दी।
नेहरू और इंदिरा युग की विदेश नीति में अंतर:
स्वतंत्र भारत की विदेश नीति को समझने के लिए नेहरू और इंदिरा गांधी के दौर की तुलना करना आवश्यक है। दोनों ही नेताओं ने भारत की कूटनीति को दिशा दी, लेकिन उनकी प्राथमिकताएँ और कार्यशैली अलग थी।
तुलनात्मक विश्लेषण:
| पहलू | नेहरू युग (1947–1964) | इंदिरा युग (1966–1984) |
|---|---|---|
| मूल दृष्टिकोण | आदर्शवाद और नैतिक नेतृत्व | यथार्थवाद और शक्ति संतुलन |
| गुटनिरपेक्षता | सिद्धांत आधारित, नैतिक रुख | व्यावहारिक, रणनीतिक संतुलन |
| महाशक्तियों से संबंध | दूरी बनाए रखने की कोशिश | सोवियत संघ के साथ रणनीतिक निकटता |
| सुरक्षा दृष्टिकोण | सीमित सैन्य तैयारी | सैन्य सुदृढ़ीकरण और परमाणु परीक्षण |
| प्रमुख घटना | NAM, पंचशील | 1971 युद्ध, पोखरण परीक्षण |
| क्षेत्रीय भूमिका | नैतिक नेतृत्व | सक्रिय हस्तक्षेप और क्षेत्रीय प्रभुत्व |
नेहरू काल ने भारत की विदेश नीति को वैचारिक और नैतिक आधार प्रदान किया। गुटनिरपेक्षता, शांति और उपनिवेशवाद-विरोध इसकी पहचान बने। वहीं इंदिरा गांधी के दौर में वही नीति अधिक व्यावहारिक और शक्ति-संतुलन पर आधारित हो गई। 1971 का युद्ध और 1974 का परमाणु परीक्षण इस बदलाव के स्पष्ट संकेत थे।
यदि नेहरू ने भारत की विदेश नीति की आत्मा गढ़ी, तो इंदिरा गांधी ने उसे सामरिक शक्ति और आत्मविश्वास दिया।
आर्थिक सुधार और वैश्विक एकीकरण का दौर (1991–2014):
1991 भारत के इतिहास में केवल आर्थिक संकट का वर्ष नहीं था, बल्कि यह विदेश नीति के पुनर्गठन का भी समय था। विदेशी मुद्रा भंडार लगभग समाप्त हो चुका था, और भारत को अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से सहायता लेनी पड़ी।
इसी संकट ने यह स्पष्ट कर दिया कि मजबूत अर्थव्यवस्था के बिना प्रभावशाली विदेश नीति संभव नहीं है और यहीं से भारत की कूटनीति में एक नया तत्व जुड़ा — आर्थिक कूटनीति (Economic Diplomacy)।
1991 के आर्थिक सुधार और विदेश नीति:
प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव और वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG Reforms) की शुरुआत की।
इसका सीधा प्रभाव भारत की विदेश नीति पर पड़ा:
- विदेशी निवेश को आकर्षित करना प्राथमिकता बना
- पश्चिमी देशों से संबंधों में सुधार हुआ
- व्यापार और रणनीति साथ-साथ चलने लगे
भारत अब केवल नैतिक शक्ति या क्षेत्रीय ताकत नहीं, बल्कि उभरती हुई आर्थिक शक्ति के रूप में खुद को प्रस्तुत करने लगा।
Look East Policy:
1990 के दशक में भारत ने दक्षिण-पूर्व एशिया की ओर ध्यान केंद्रित किया।
Look East Policy का उद्देश्य था:
- ASEAN देशों से व्यापार बढ़ाना
- चीन के बढ़ते प्रभाव का संतुलन
- ASEAN देशों के साथ समुद्री संपर्क मजबूत करना
यह नीति आगे चलकर “Act East Policy” की नींव बनी।
भारत-अमेरिका संबंधों में बदलाव:
शीत युद्ध की समाप्ति के बाद वैश्विक शक्ति संरचना बदल चुकी थी। 1990 के दशक में भारत और अमेरिका के संबंध धीरे-धीरे सुधरने लगे।
2005 का भारत-अमेरिका परमाणु समझौता:
18 जुलाई 2005 को वाशिंगटन में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने एक ऐतिहासिक भारत-अमेरिका असैनिक परमाणु समझौते (India–US Civil Nuclear Deal) की घोषणा की।
यह समझौता सिर्फ ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग का समझौता नहीं था, बल्कि इसने भारत-अमेरिका संबंधों को एक नई रणनीतिक ऊंचाई प्रदान की। यह उस बदलती वैश्विक सोच का प्रतीक था, जिसमें भारत को एक जिम्मेदार और उभरती हुई शक्ति के रूप में देखा जाने लगा।
इस समझौते की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि परमाणु अप्रसार संधि (NPT) पर हस्ताक्षर न करने के बावजूद भारत को वैश्विक परमाणु व्यापार प्रणाली में प्रवेश की अनुमति मिली। लगभग 30 वर्षों तक चले अंतरराष्ट्रीय परमाणु प्रतिबंध और अलगाव के बाद, भारत को वैश्विक स्तर पर वैध और विश्वसनीय परमाणु शक्ति के रूप में स्वीकार किया गया।
यह समझौता ऐतिहासिक क्यों था?
- भारत को एक “जिम्मेदार परमाणु शक्ति” के रूप में मान्यता मिली।
- परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (NSG) से विशेष छूट प्राप्त हुई।
- भारत को असैनिक परमाणु ईंधन और तकनीक तक पहुँच मिली।
- भारत-अमेरिका के बीच दीर्घकालिक रणनीतिक सहयोग की नींव मजबूत हुई।
यह समझौता इस बात का संकेत था कि भारत अब केवल क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि वैश्विक व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण भागीदार के रूप में उभर रहा है। इसके साथ ही भारत की विदेश नीति में “रणनीतिक स्वायत्तता” और “व्यावहारिक बहुपक्षीयता” (Pragmatic Multilateralism) का संतुलन स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा।
बहुध्रुवीय विश्व में भारत की स्थिति:
1991 में सोवियत संघ के विघटन के साथ ही शीत युद्ध का अंत हो गया। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में केवल एक ही महाशक्ति बची — संयुक्त राज्य अमेरिका।
सैन्य शक्ति, आर्थिक प्रभाव, तकनीकी बढ़त और वैश्विक संस्थाओं पर प्रभाव के कारण 1990 का दशक अमेरिकी प्रभुत्व का दौर माना गया। इसी कारण उस समय विश्व व्यवस्था को एकध्रुवीय (Unipolar World Order) कहा जाने लगा।
लेकिन यह स्थिति स्थायी नहीं रही। 2000 के दशक में चीन की तेज आर्थिक वृद्धि, सैन्य आधुनिकीकरण और वैश्विक व्यापार में बढ़ती भूमिका ने शक्ति-संतुलन को बदलना शुरू कर दिया।
साथ ही यूरोपीय संघ (EU) एक संगठित आर्थिक शक्ति के रूप में उभरा, और रूस ने भी अपने रणनीतिक प्रभाव को पुनः स्थापित करने का प्रयास किया। परिणामस्वरूप अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था धीरे-धीरे बहुध्रुवीय (Multipolar) स्वरूप लेने लगी।
इस परिवर्तित वैश्विक परिदृश्य में भारत की विदेश नीति ने संतुलित और बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाया। भारत ने:
- रूस के साथ पारंपरिक रणनीतिक संबंध बनाए रखे
- अमेरिका के साथ रक्षा और तकनीकी सहयोग को मजबूत किया
- ASEAN और पूर्वी एशिया के साथ आर्थिक जुड़ाव बढ़ाया
इसी दौर में “Multi-Engagement” की सोच विकसित हुई — यानी विभिन्न शक्तियों के साथ समानांतर संबंध बनाए रखना। यही दृष्टिकोण आगे चलकर “Multi-Alignment” में परिवर्तित हुआ, जहाँ भारत किसी एक गुट का हिस्सा बनने के बजाय कई प्रमुख शक्तियों के साथ संतुलित और स्वतंत्र साझेदारी करने लगा।
1991 से 2014 तक का दौर भारत की विदेश नीति में आर्थिक शक्ति, रणनीतिक संतुलन और वैश्विक एकीकरण का समय था। यदि 1971 ने भारत को क्षेत्रीय शक्ति के रूप में स्थापित किया, तो 1991 के बाद के सुधारों ने उसे उभरती हुई वैश्विक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करना शुरू किया।
2014 के बाद भारत की विदेश नीति: नई रणनीतिक दिशा
2014 के बाद भारत की विदेश नीति में स्पष्ट रूप से अधिक सक्रिय, आत्मविश्वासी और बहुआयामी दृष्टिकोण दिखाई देता है। यदि 1991 के बाद आर्थिक कूटनीति प्रमुख थी, तो 2014 के बाद रणनीतिक विस्तार, क्षेत्रीय नेतृत्व और वैश्विक भूमिका पर विशेष बल दिया गया।
इस दौर में भारत की विदेश नीति का केंद्रीय विचार रहा — रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए वैश्विक शक्ति संतुलन में सक्रिय भागीदारी।
Act East Policy:
“Look East Policy” को 2014 के बाद “Act East Policy” में परिवर्तित किया गया। यह केवल दक्षिण-पूर्व एशिया से आर्थिक संबंध बढ़ाने की नीति नहीं थी, बल्कि इसमें रणनीतिक और रक्षा सहयोग भी शामिल किया गया। इसका उद्देश्य था:
- ASEAN देशों के साथ गहरे आर्थिक संबंध
- इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में समुद्री सहयोग
- चीन के बढ़ते प्रभाव का संतुलन
इस प्रकार भारत की विदेश नीति ने पूर्वी एशिया को अपने रणनीतिक दायरे में अधिक स्पष्ट रूप से शामिल किया।
Neighbourhood First Policy:
दक्षिण एशिया भारत की विदेश नीति का प्राथमिक क्षेत्र रहा है। “Neighbourhood First” नीति के तहत भारत ने अपने पड़ोसी देशों — नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, भूटान और मालदीव — के साथ सहयोग बढ़ाने पर बल दिया। इसका उद्देश्य था:
- क्षेत्रीय स्थिरता सुनिश्चित करना
- चीन के प्रभाव को संतुलित करना
- आर्थिक और अवसंरचनात्मक साझेदारी को मजबूत करना
यह नीति दर्शाती है कि भारत की विदेश नीति में पड़ोस को केंद्रीय स्थान प्राप्त है।
Indo-Pacific रणनीति:
इंडो-पैसिफिक क्षेत्र 21वीं सदी की भू-राजनीति का केंद्र बन चुका है। भारत ने “Free, Open and Inclusive Indo-Pacific” की अवधारणा का समर्थन किया। जिसके प्रमुख सिद्धांत हैं:
- समुद्री सुरक्षा
- व्यापार मार्गों की स्वतंत्रता
- नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था
इन सिद्धांतों के माध्यम से भारत की विदेश नीति ने हिंद महासागर से लेकर प्रशांत क्षेत्र तक अपनी रणनीतिक उपस्थिति को मजबूत किया।
QUAD और चीन की चुनौती:
अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर भारत ने “QUAD” (Quadrilateral Security Dialogue) को पुनर्जीवित किया। QUAD का उद्देश्य औपचारिक सैन्य गठबंधन बनाना नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता, समुद्री सुरक्षा और आपूर्ति श्रृंखला में एक-दूसरे का सहयोग करना है।
हालाँकि चीन इसे अपने प्रभाव को संतुलित करने की पहल के रूप में देखता है। यहाँ स्पष्ट दिखता है कि भारत की विदेश नीति चीन के साथ प्रतिस्पर्धा और सहयोग — दोनों को संतुलित करने की रणनीति अपनाती है।
रूस-यूक्रेन युद्ध में भारत की संतुलित नीति:
2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत की विदेश नीति ने बहु-संरेखण (Multi-Alignment) का स्पष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया।
भारत ने:
- संयुक्त राष्ट्र में खुलकर किसी पक्ष का समर्थन करने के बजाय शांति, संवाद और कूटनीतिक समाधान पर जोर दिया और संतुलित रुख बनाए रखा।
- रूस से ऊर्जा आयात जारी रखा
- साथ ही अमेरिका और यूरोपीय देशों से रणनीतिक संवाद बनाए रखा।
यह संतुलन दर्शाता है कि भारत किसी एक गुट में शामिल होने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देता है, और यही आज की भारत की विदेश नीति की पहचान है — स्वतंत्र, संतुलित और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में सक्रिय।
2014 के बाद भारत की विदेश नीति ने बहु-संरेखण (Multi-Alignment) को व्यवहारिक रूप दिया है। एक ओर QUAD और Indo-Pacific के माध्यम से पश्चिमी साझेदारियों को मजबूत किया गया, तो दूसरी ओर BRICS और SCO जैसे मंचों पर सक्रिय रहकर वैश्विक दक्षिण और यूरेशियाई शक्तियों के साथ संतुलन बनाए रखा गया।
यह स्पष्ट संकेत है कि भारत 21वीं सदी की बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में एक स्वतंत्र, आत्मविश्वासी और निर्णायक शक्ति के रूप में उभर रहा है।
भारत की विदेश नीति के मूल सिद्धांत:
भारत की विदेश नीति केवल घटनाओं की प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि कुछ स्थायी सिद्धांतों पर आधारित है। समय के साथ रणनीतियाँ बदलती रही हैं, लेकिन मूल सोच में निरंतरता दिखाई देती है।
रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy):
रणनीतिक स्वायत्तता भारत की विदेश नीति का सबसे महत्वपूर्ण आधार रही है।
शीत युद्ध के दौरान गुटनिरपेक्षता (Non-Alignment) इसी सोच का प्रारंभिक रूप थी। आज यह विचार “Multi-Alignment” के रूप में विकसित हो चुका है, लेकिन मूल भावना वही है — भारत किसी एक शक्ति गुट पर निर्भर नहीं रहेगा।
- रक्षा सहयोग अमेरिका से
- ऊर्जा सहयोग रूस से
- व्यापार और निवेश पश्चिम व एशिया दोनों से
इस प्रकार भारत की विदेश नीति राष्ट्रीय हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देती है और बाहरी दबावों से स्वतंत्र निर्णय लेने का प्रयास करती है।
बहु-संरेखण (Multi-Alignment):
21वीं सदी की बहुध्रुवीय दुनिया में भारत ने “Multi-Alignment” की नीति अपनाई है। यह पारंपरिक गुटनिरपेक्षता से अलग है। अब भारत एक साथ कई शक्तियों के साथ साझेदारी करता है —
- QUAD में अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ
- BRICS में चीन और रूस के साथ
- SCO में मध्य एशियाई देशों के साथ
यह संतुलन दिखाता है कि भारत की विदेश नीति प्रतिस्पर्धा और सहयोग — दोनों को साथ लेकर चलती है।
सॉफ्ट पावर (Soft Power): योग, संस्कृति और लोकतंत्र
भारत की वैश्विक पहचान केवल सैन्य या आर्थिक शक्ति पर आधारित नहीं है, बल्कि उसकी सभ्यता, संस्कृति और लोकतांत्रिक मूल्यों से भी निर्मित होती है। यही तत्व भारत की विदेश नीति को एक मजबूत सॉफ्ट पावर आयाम देते हैं।
अंतरराष्ट्रीय योग दिवस, भारतीय संस्कृति, बॉलीवुड का वैश्विक प्रभाव और विश्वभर में फैला प्रवासी भारतीय समुदाय — ये सभी भारत की सकारात्मक छवि को मजबूत करते हैं।
साथ ही, दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में भारत की पहचान उसे नैतिक वैधता प्रदान करती है।
इस प्रकार भारत की विदेश नीति सॉफ्ट पावर का उपयोग कर बिना दबाव के वैश्विक प्रभाव स्थापित करने का प्रयास करती है।
वैश्विक दक्षिण (Global South) का नेतृत्व:
हाल के वर्षों में भारत ने स्वयं को “Global South” की आवाज के रूप में प्रस्तुत किया है। G20 अध्यक्षता के दौरान भारत ने विकासशील देशों की चिंताओं — जैसे ऋण संकट, जलवायु, वित्त और खाद्य सुरक्षा — को प्रमुखता दी।
यह दर्शाता है कि भारत की विदेश नीति केवल अपने राष्ट्रीय हितों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह विकासशील देशों के सामूहिक हितों को भी मंच प्रदान करना चाहती है।
इन सभी सिद्धांतों को मिलाकर देखा जाए तो स्पष्ट होता है कि भारत की विदेश नीति आदर्शवाद और यथार्थवाद का संतुलित मिश्रण है।
भारत की विदेश नीति के सामने भविष्य की चुनौतियाँ:
21वीं सदी का वैश्विक परिदृश्य अनिश्चित, प्रतिस्पर्धी और तीव्र गति से बदलता हुआ है। ऐसे में भारत की विदेश नीति के सामने केवल अवसर ही नहीं, बल्कि गंभीर रणनीतिक परीक्षाएँ भी खड़ी हैं।
चीन का आक्रामक उदय और सीमाई तनाव:
चीन केवल आर्थिक प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष सामरिक चुनौती भी है।
- LAC और अन्य सीमाओं पर लगातार तनाव
- हिंद महासागर में चीनी नौसैनिक सक्रियता
- पड़ोसी देशों में बढ़ता चीनी निवेश
भारत के लिए यह केवल सीमा विवाद का प्रश्न नहीं, बल्कि दीर्घकालिक शक्ति संतुलन का मुद्दा है। आने वाले वर्षों में भारत की विदेश नीति को चीन के साथ “प्रतिरोध + संतुलन + सीमित सहयोग” की त्रिस्तरीय रणनीति अपनानी पड़ सकती है।
हिंद-प्रशांत में शक्ति संतुलन की दौड़:
इंडो-पैसिफिक क्षेत्र वैश्विक व्यापार और सैन्य प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन चुका है। यदि भारत इस क्षेत्र में सक्रिय उपस्थिति नहीं रखता, तो समुद्री सुरक्षा और आपूर्ति मार्गों पर उसका प्रभाव सीमित हो सकता है। QUAD, समुद्री अभ्यास और नौसैनिक आधुनिकीकरण अब विकल्प नहीं, बल्कि रणनीतिक आवश्यकता बन चुके हैं।
ऊर्जा और आपूर्ति श्रृंखला की असुरक्षा:
रूस-यूक्रेन युद्ध ने दिखा दिया कि ऊर्जा और खाद्य आपूर्ति कितनी संवेदनशील हो सकती है। भारत जैसे ऊर्जा-आयातक देश के लिए पश्चिम एशिया, रूस और मध्य एशिया के साथ संतुलित संबंध बनाए रखना अनिवार्य है। ऊर्जा सुरक्षा अब केवल आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि भारत की विदेश नीति का केंद्रीय रणनीतिक प्रश्न बन चुकी है।
टेक्नोलॉजी, सेमीकंडक्टर और डिजिटल भू-राजनीति:
भविष्य की शक्ति AI, डेटा, साइबर सुरक्षा और सेमीकंडक्टर चिप्स से तय होगी। यदि भारत वैश्विक तकनीकी आपूर्ति श्रृंखलाओं में अपनी जगह मजबूत नहीं करता, तो वह रणनीतिक रूप से निर्भर हो सकता है। इसलिए तकनीकी कूटनीति अब पारंपरिक कूटनीति जितनी ही महत्वपूर्ण हो गई है।
UNSC स्थायी सदस्यता: प्रतिष्ठा बनाम वास्तविकता
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में स्थायी सदस्यता भारत की लंबे समय से चली आ रही आकांक्षा है। परंतु वैश्विक शक्ति राजनीति, वीटो संरचना और सुधार की धीमी प्रक्रिया इस लक्ष्य को जटिल बनाती है। यह चुनौती केवल प्रतिनिधित्व की नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संरचना में भारत की वास्तविक स्थिति को दर्शाने की है।
इन सभी चुनौतियों को देखते हुए स्पष्ट है कि आने वाले दशकों में भारत की विदेश नीति को केवल संतुलन नहीं, बल्कि साहसिक और दीर्घकालिक रणनीतिक सोच की आवश्यकता होगी। अब सवाल यह नहीं है कि भारत वैश्विक राजनीति में भाग लेगा या नहीं — बल्कि यह है कि वह किस स्तर पर और किस प्रभाव के साथ नेतृत्व करेगा।
भारत की विदेश नीति: प्रमुख ऐतिहासिक मोड़ (Timeline)
| वर्ष | प्रमुख घटना | भारत की विदेश नीति पर प्रभाव |
|---|---|---|
| 1947 | स्वतंत्रता और विभाजन | स्वतंत्र विदेश नीति की शुरुआत; गुटनिरपेक्ष सोच की नींव |
| 1955 | बांडुंग सम्मेलन | एशिया-अफ्रीका एकजुटता; गुटनिरपेक्ष आंदोलन की दिशा स्पष्ट |
| 1962 | भारत-चीन युद्ध | आदर्शवाद से यथार्थवाद की ओर रणनीतिक बदलाव |
| 1971 | बांग्लादेश युद्ध और भारत-सोवियत संधि | क्षेत्रीय शक्ति के रूप में उभार; शक्ति संतुलन की सक्रिय नीति |
| 1974 | पोखरण परमाणु परीक्षण | रणनीतिक स्वायत्तता का प्रदर्शन |
| 1991 | आर्थिक उदारीकरण | आर्थिक कूटनीति और वैश्विक एकीकरण की शुरुआत |
| 1998 | परमाणु परीक्षण (पोखरण-II) | भारत का खुला परमाणु शक्ति के रूप में उभरना |
| 2005 | भारत-अमेरिका असैनिक परमाणु समझौता | वैश्विक परमाणु व्यवस्था में वैधता; रणनीतिक साझेदारी मजबूत |
| 2014 | Act East और Neighbourhood First | इंडो-पैसिफिक फोकस और क्षेत्रीय सक्रियता |
| 2017 | QUAD पुनर्जीवित | हिंद-प्रशांत में शक्ति संतुलन की स्पष्ट रणनीति |
| 2022 | रूस-यूक्रेन युद्ध | Multi-Alignment और रणनीतिक स्वायत्तता की परीक्षा |
| 2023 | G20 अध्यक्षता | वैश्विक दक्षिण नेतृत्व और कूटनीतिक प्रभाव का प्रदर्शन |
निष्कर्ष: आदर्शवाद से बहु-संरेखण तक की यात्रा
1947 में स्वतंत्रता के साथ शुरू हुई भारत की विदेश नीति की यात्रा आज एक जटिल और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था तक पहुँच चुकी है।
नेहरू युग के आदर्शवादी गुटनिरपेक्ष दृष्टिकोण से लेकर इंदिरा गांधी के यथार्थवादी शक्ति संतुलन, 1991 के बाद की आर्थिक कूटनीति और 21वीं सदी के बहु-संरेखण (Multi-Alignment) तक — भारत ने हर दौर में स्वयं को परिस्थितियों के अनुसार ढाला है।
आज भारत किसी एक शक्ति गुट का हिस्सा नहीं, बल्कि अनेक वैश्विक मंचों पर संतुलनकारी भूमिका निभाने वाला राष्ट्र है। QUAD से लेकर BRICS, Indo-Pacific से लेकर Global South तक, भारत की कूटनीति का लक्ष्य स्पष्ट है — रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना।
भविष्य की चुनौतियाँ जटिल हैं — चीन का उदय, तकनीकी प्रतिस्पर्धा, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक शक्ति राजनीति। फिर भी, भारत की विदेश नीति ने यह सिद्ध किया है कि वह केवल प्रतिक्रिया देने वाली नहीं, बल्कि दिशा तय करने वाली नीति बन चुकी है।
आखिरकार, भारत की विदेश नीति केवल सीमाओं और समझौतों की कहानी नहीं है; यह एक ऐसे राष्ट्र की यात्रा है जो अपनी सभ्यता, लोकतंत्र और रणनीतिक सोच के बल पर 21वीं सदी की वैश्विक राजनीति में एक निर्णायक स्थान बनाने की ओर अग्रसर है।