Makar Sankranti: भारतीय सभ्यता, कृषि और खगोल विज्ञान का पर्व

Makar Sankranti को भारत में अक्सर एक पारंपरिक त्योहार के रूप में देखा जाता है, लेकिन वास्तविकता में यह पर्व भारतीय सभ्यता की वैज्ञानिक सोच, कृषि आधारित समाज और खगोलीय समझ का जीवंत उदाहरण है। सूर्य की स्थिति से जुड़ा यह पर्व भारत की उस ज्ञान परंपरा को दर्शाता है, जिसमें प्रकृति, समय और समाज को एक साथ समझा गया।

Makar Sankranti क्या है?

मकर संक्रांति भारत का एक प्रमुख पर्व है, जो उस दिन मनाया जाता है जब सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करता है। इसी दिन से सूर्य की गति उत्तर दिशा (उत्तरायण) की ओर हो जाती है, जिसे भारतीय परंपरा में अत्यंत शुभ माना गया है।

यह पर्व केवल धार्मिक उत्सव नहीं है, बल्कि भारतीय खगोल विज्ञान, कृषि चक्र और सभ्यतागत सोच से गहराई से जुड़ा हुआ है। मकर संक्रांति हर साल लगभग 14 या 15 जनवरी को मनाई जाती है और यह उन गिने-चुने भारतीय पर्वों में से है जिनकी तारीख लगभग स्थिर रहती है, क्योंकि यह सूर्य की वास्तविक खगोलीय स्थिति पर आधारित है।

Makar Sankranti के दौरान पृथ्वी का 23.5 डिग्री झुकाव, सूर्य किरणों का पृथ्वी की ओर पड़ना और अंतरिक्ष से दिखाई देता दृश्य
पृथ्वी का 23.5° अक्षीय झुकाव और सूर्य किरणों की दिशा, जो मकर संक्रांति पर उत्तरायण की शुरुआत को दर्शाती है।

सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करता है:

इस दिन से सूर्य की गति दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर हो जाती है, यानी सूर्य की किरणें धीरे-धीरे उत्तरी गोलार्ध की ओर अधिक सीधी पड़ने लगती हैं।

अगर हम इसे अंतरिक्ष विज्ञान की दृष्टि से देखें तो पृथ्वी की धुरी लगभग 23.5° झुकी हुई है और पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करते हुए अपनी धुरी पर भी घूमती है। इसी झुकाव और कक्षीय गति के कारण सूर्य की सीधी किरणें धीरे-धीरे दक्षिणी गोलार्ध से खिसककर उत्तरी गोलार्ध की ओर बढ़ने लगती हैं। यही वह खगोलीय बिंदु होता है जहाँ सूर्य की वार्षिक आभासी गति दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर परिवर्तित होती है।

इसका परिणाम यह होता है कि उत्तरी गोलार्ध में दिन की अवधि धीरे-धीरे बढ़ने लगती है, सूर्य की ऊँचाई आकाश में अधिक होने लगती है और मौसम में परिवर्तन दिखाई देने लगता है। यह पूरी प्रक्रिया किसी धार्मिक मान्यता पर नहीं, बल्कि पृथ्वी–सूर्य की ज्यामितीय स्थिति और खगोलीय नियमों पर आधारित होती है, जिसे भारतीय खगोल विज्ञान ने बहुत पहले ही पहचान लिया था।

जिस समय यूरोप में कैलेंडर चर्च-आधारित थे, उसी समय भारत में समय की गणना सूर्य की वास्तविक गति पर आधारित थी — यही सभ्यतागत आत्मनिर्भरता भारत की शक्ति रही है।

भारतीय पंचांग बनाम ग्रेगोरियन कैलेंडर:

किसी भी सभ्यता की वास्तविक शक्ति उसके समय को देखने और मापने के तरीके में छिपी होती है। समय केवल तारीखों का क्रम नहीं होता, बल्कि वह यह तय करता है कि समाज कब फसल बोएगा, कब काटेगा, कब उत्सव मनाएगा और कब शासन चलेगा। इसी संदर्भ में भारतीय पंचांग और ग्रेगोरियन कैलेंडर दो अलग-अलग सभ्यतागत दृष्टिकोणों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

भारतीय पंचांग सूर्य, चंद्रमा और नक्षत्रों की वास्तविक खगोलीय गति पर आधारित है। मकर संक्रांति जैसे पर्व इस बात का उदाहरण हैं कि भारत में समय की गणना सीधे प्रकृति और ब्रह्मांडीय नियमों से जुड़ी थी। यही कारण है कि कृषि, मौसम, धार्मिक अनुष्ठान और सामाजिक गतिविधियाँ एक सुसंगत चक्र में संचालित होती थीं।

इसके विपरीत, ग्रेगोरियन कैलेंडर का वर्तमान स्वरूप यूरोप में चर्च और राजसत्ता की प्रशासनिक आवश्यकताओं से विकसित हुआ। यह कैलेंडर मुख्यतः सौर वर्ष की गणना तो करता है, लेकिन इसे सांस्कृतिक या कृषि चक्रों से जोड़ने का उद्देश्य नहीं था। इसका उपयोग शासन, कर व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय समन्वय के लिए अधिक किया गया।

आज भी भारत में एक दोहरे समय-बोध की स्थिति है — शासन, अर्थव्यवस्था और वैश्विक संपर्क के लिए ग्रेगोरियन कैलेंडर, जबकि सामाजिक, सांस्कृतिक और कृषि जीवन के लिए भारतीय पंचांग। मकर संक्रांति जैसे पर्व इस बात की याद दिलाते हैं कि भारतीय सभ्यता ने समय को केवल घड़ी और तारीख में नहीं, बल्कि प्रकृति, समाज और सत्ता के संतुलन के रूप में देखा।

Makar Sankranti की तारीख लगभग स्थिर क्यों रहती है?

मकर संक्रांति की तारीख लगभग हर साल 14 या 15 जनवरी को ही इसलिए आती है, क्योंकि यह पर्व चंद्रमा नहीं बल्कि सूर्य की वास्तविक खगोलीय स्थिति पर आधारित है। भारतीय पंचांग में मकर संक्रांति उस क्षण को दर्शाती है जब सूर्य अपनी वार्षिक यात्रा में मकर राशि में प्रवेश करता है।

अधिकांश भारतीय त्योहार चंद्र पंचांग पर आधारित होते हैं, जहाँ महीने चंद्रमा की गति से तय होते हैं। चंद्र वर्ष लगभग 354 दिन का होता है, इसलिए ऐसे त्योहारों की तारीखें हर साल बदलती रहती हैं। इसके विपरीत, मकर संक्रांति सौर वर्ष से जुड़ी है, जिसकी अवधि लगभग 365 दिन होती है। यही कारण है कि इसकी तारीख में बहुत अधिक बदलाव नहीं होता।

भू-राजनीतिक और सभ्यतागत दृष्टि से देखें तो यह स्थिरता केवल एक खगोलीय तथ्य नहीं, बल्कि समय प्रबंधन की एक उन्नत प्रणाली का प्रमाण है। कृषि समाजों के लिए यह आवश्यक था कि मौसम और फसल से जुड़े पर्व एक निश्चित समय पर ही आएँ। भारतीय पंचांग ने इस आवश्यकता को समझते हुए सूर्य-आधारित पर्वों को सामाजिक जीवन से जोड़ा।

एक पर्व, अनेक नाम: भारत की विविधता

भारत में Makar Sankranti किसी एक नाम, एक परंपरा या एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है। देश के अलग-अलग हिस्सों में इसे अलग-अलग नामों से मनाया जाता है, लेकिन इन सभी पर्वों के पीछे एक ही खगोलीय और कृषि आधार काम करता है। यही भारत की सबसे बड़ी विशेषता है — विविधता के भीतर एक साझा सभ्यतागत ढांचा।

  • उत्तर भारत – मकर संक्रांति
  • गुजरात – उत्तरायण
  • पंजाब – लोहड़ी
  • तमिलनाडु – पोंगल
  • असम – भोगाली बिहू (माघ बिहु)
  • उत्तराखंड –  घुघुतिया
घुघुति माला पहने बच्चे — उत्तराखंड में मकर संक्रांति (घुघुतिया) की जीवित लोक परंपरा।

उत्तराखंड में मकर संक्रांति कैसे मनाई जाती है?

उत्तराखंड में मकर संक्रांति को “घुघुतिया” या “घुघुति त्यार” कहा जाता है। यह पर्व केवल सूर्य या कृषि से नहीं, बल्कि पहाड़, लोकजीवन और प्रकृति से गहरे जुड़ाव को दर्शाता है।

घुघुति माला की परंपरा:

इस दिन आटे, गुड़ और घी से बने पक्षियों के आकार के पकवान बनाए जाते हैं, जिन्हें घुघुति कहा जाता है। इन्हें धागे में पिरोकर बच्चों के गले में माला की तरह पहनाया जाता है।

सुबह बच्चे पक्षियों को बुलाते हुए कहते हैं: “काले कौवा, काले, घुघुति माला खाले”

यह परंपरा बताती है कि उत्तराखंड की लोकसंस्कृति में मानव और प्रकृति के बीच दूरी नहीं, बल्कि संवाद है।

आधुनिक भारत में मकर संक्रांति का अर्थ:

Urban India और Cultural Disconnect:

आधुनिक भारत के शहरी वर्ग के लिए मकर संक्रांति अक्सर एक WhatsApp forward या सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित रह गई है। शहरों में जीवन की गति, कॉर्पोरेट कैलेंडर और वैश्विक समय-सारिणी ने भारतीय पर्वों को उनके मूल संदर्भ से अलग कर दिया है।

यह केवल सांस्कृतिक दूरी नहीं, बल्कि सभ्यतागत स्मृति का क्षरण है — जहाँ समय को अब सूर्य और मौसम नहीं, बल्कि मीटिंग और डेडलाइन तय करती हैं।

Festivals as cultural soft power:

विश्व राजनीति में आज संस्कृति एक प्रभावशाली Soft Power Tool बन चुकी है। जैसे चीन अपने नववर्ष को, या पश्चिम अपने क्रिसमस को वैश्विक पहचान देता है, वैसे ही भारतीय पर्व भी भारत की सभ्यतागत कहानी दुनिया तक पहुँचा सकते हैं।

Makar Sankranti जैसे पर्व यह दिखाते हैं कि भारत की संस्कृति केवल आस्था नहीं, बल्कि ज्ञान, प्रकृति और सामाजिक संगठन पर आधारित रही है। यह Narrative भारत की वैश्विक छवि को धार्मिक से आगे ले जाकर सभ्यतागत और बौद्धिक शक्ति में बदलता है।

क्यों भारतीय पर्व आज भी प्रासंगिक हैं?

  • भारतीय पर्व इसलिए प्रासंगिक हैं क्योंकि वे स्थायित्व (Stability) सिखाते हैं — बदलती दुनिया में भी समय, प्रकृति और समाज के बीच संतुलन बनाए रखना।
  • जलवायु परिवर्तन, सामाजिक तनाव और पहचान संकट के दौर में ऐसे पर्व हमें याद दिलाते हैं कि विकास केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सभ्यतागत निरंतरता भी है।

भारत–नेपाल संबंध केवल कूटनीति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि एक साझी सभ्यतागत समय-रेखा पर आधारित हैं। मकर संक्रांति जैसे पर्व दोनों देशों में समान रूप से मनाए जाते हैं, जो यह दिखाते हैं कि आधुनिक सीमाओं से पहले भी इस क्षेत्र में समय और संस्कृति का बोध साझा था।

Makar Sankranti हमें यह याद दिलाती है कि भारत में पर्व कभी भी केवल आस्था का ही विषय नहीं रहे, बल्कि समय, प्रकृति और समाज को जोड़ने वाली सभ्यतागत प्रणालियाँ रहे हैं। यह पर्व दिखाता है कि भारतीय सभ्यता ने समय को नियंत्रित करने के बजाय उसे समझने और उसके साथ चलने का रास्ता चुना। औपनिवेशिक और आधुनिक व्यवधानों के बावजूद ऐसे पर्व भारत की सांस्कृतिक निरंतरता को जीवित रखते हैं।

आज के वैश्विक और शहरी संदर्भ में Makar Sankranti भारत की Soft Power और आत्मबोध दोनों का प्रतीक बन सकती है। अंततः, जो सभ्यता अपने समय-बोध को बचा लेती है, वही इतिहास में अपना स्थान सुरक्षित रखती है।

मकर संक्रांति से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न: मकर संक्रांति के दिन किसकी पूजा की जाती है?
उत्तर: मकर संक्रांति के दिन मुख्य रूप से सूर्य देवता की पूजा की जाती है, क्योंकि यह पर्व सूर्य के दक्षिणायन से उत्तरायण में प्रवेश का प्रतीक है। इसके अलावा, भारत के अलग-अलग हिस्सों में स्थानीय देवी-देवताओं और कृषि से जुड़े प्रतीकों की भी पूजा होती है। उदाहरण के लिए:

  • उत्तर भारत: सूर्य देवता और नदी देवी (गंगा में स्नान)
  • गुजरात: सूर्य को अर्घ्य देना और पतंग उत्सव
  • पंजाब: अग्नि और फसल-संबंधित प्रतीक
  • तमिलनाडु: सूर्य और कृषि देवी की पूजा (पोंगल)
  • उत्तराखंड: सूर्य और प्राकृतिक देवी-देवताओं की पूजा

प्रश्न: मकर संक्रांति पर पतंग क्यों उड़ाते हैं?
उत्तर: मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाना मुख्य रूप से उत्तरायण के आगमन का उत्सव है। सूर्य के मकर राशि में प्रवेश और दिन बढ़ने के प्रतीक के रूप में यह परंपरा विकसित हुई।

  • सांस्कृतिक दृष्टि से: पतंग उत्सव समाज को एकजुट करने और खुशी और मेल-जोल का माध्यम है।
  • प्राकृतिक / वैज्ञानिक दृष्टि से: सर्दियों के बाद हवा का मौसम पतंग उड़ाने के अनुकूल होता है।
  • Geopolitical / Civilizational angle: यह दर्शाता है कि भारत में पर्व केवल पूजा तक सीमित नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन, प्राकृतिक चक्र और उत्सव को जोड़ने का माध्यम हैं।

पतंग उड़ाना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह आधुनिक शहरों में भी पर्व के स्थायित्व और साझा पहचान को जीवित रखता है।

 

 

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