Operation Sindoor के दौरान भारत की ओर पाकिस्तान से कई मिसाइलें दागी गईं। इनमें से कुछ बिना विस्फोट के इंटेक्ट रह गईं, जो तकनीकी अध्ययन के लिए दुर्लभ अवसर प्रदान करती हैं। खासकर Chinese Missile PL-15E, जिसे पाकिस्तान ने अपने JF-17 थंडर विमान से लॉन्च किया था, वह पूरी तरह से इंटेक्ट थी और भारत की धरती पर गिरी। अब DRDO उस मिसाइल का अध्ययन कर रहा है।
यह मौका भारत के लिए नई तकनीकी सीखने और अस्त्र जैसी एयर-टू-एयर मिसाइलों को बेहतर बनाने का एक बड़ा अवसर है। आइए पहले इतिहास के कुछ उदाहरणों को देखें, जिन्होंने दिखाया कि Reverse Engineering तकनीक कैसे देशों की रक्षा क्षमताओं को बदल सकती है।

इतिहास में Reverse Engineering के उदाहरण:
1958 में AIM-7 / AIM-9 और USSR:-
1958 में, चीन और ताइवान के बीच संघर्ष शुरू हुआ। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ताइवान को अपना हिस्सा मानती थी और अपनी सेनाओं को ताइवान के कई टापुओं पर उतार रही थी। इसी दौरान अमेरिकी एयरफोर्स ने चीनी फौज पर AIM-9 Sidewinder और AIM-7 Sparrow मिसाइलें बरसाईं।
कुछ मिसाइलें हवा में ही चीनी पायलटों के विमान पर फंस गईं, विस्फोट नहीं हुआ और उन विमानों को किसी तरह से नीचे जमीन पर उतार लिया गया। मतलब वह अमेरिकी मिसाइलें सुरक्षित रूप से चीन के हाथ लग गईं। उस समय चीन के पास इन मिसाइलों की Reverse Engineering की तकनीक नहीं थी, इसलिए उन्होंने यह मिसाइल USSR को सौंप दी। USSR ने उनका अध्ययन किया और कई नए वेरिएंट विकसित किए, जिनमें दुनिया की प्रसिद्ध K-30 मिसाइल भी शामिल है।
2011 में RQ-170 स्टेल्थ ड्रोन और Iran:-
2011 में अमेरिकी स्टेल्थ ड्रोन RQ-170 Iran के क्षेत्र में आया और पकड़ा गया। कुछ साल बाद Iran ने दावा किया कि उसने इस ड्रोन की Reverse Engineering कर ली गई है। यह घटना एक बड़ा Geopolitical Event साबित हुई और इसने दिखाया कि Reverse Engineering तकनीक किस तरह से देशों की Capabilities बढ़ा सकती है।
2022 में BrahMos मिसाइल का Misfire:-
2022 में भारत की BrahMos मिसाइल गलती से पाकिस्तान चली गई। मिसाइल का सही तरीके से विस्फोट हुआ, इसलिए पाकिस्तान के पास इसकी Reverse Engineering का कोई मौका ही नहीं था। चार साल बीत चुके हैं, लेकिन पाकिस्तान की ओर से इस मामले में कोई भी खबर नहीं आई है, और ना ही आने की उम्मीद है।
Chinese Missile PL-15E और DRDO की जांच:
PL-15E, PL-15 का Export Variant है, जिसे पाकिस्तान ने कुछ साल पहले खरीदा था और अपने JF-17 थंडर विमान में उपयोग किया। Operation Sindoor के दौरान यह मिसाइल भारत की तरफ आई, लेकिन विस्फोट नहीं हुआ और पूरी तरह इंटेक्ट रह गई। इस दुर्लभ मौके का फायदा उठाते हुए DRDO ने मिसाइल का अध्ययन शुरू कर दिया है।
रिपोर्टों के अनुसार, PL-15E में कई Advanced Features मौजूद हैं। इसमें AESA-based active seeker और Sophisticated Anti-Jamming क्षमताएँ शामिल हैं। इसके Propulsion System से यह Mach 5+ की गति तक पहुँच सकती है। इंटेक्ट स्थिति में होने के कारण DRDO को इसके Component-Level निरीक्षण और अध्ययन का अवसर मिला, जो भविष्य में अस्त्र जैसी मिसाइलों के सुधार में मददगार साबित हो सकता है।
Astra और PL-15E की तुलना करने पर कुछ अंतर स्पष्ट होते हैं। Astra की वर्तमान रेंज लगभग 130–160 किमी है, जबकि PL-15E लगभग 145–200 किमी तक पहुँच सकता है। Astra Mach-2 गति से उड़ती है, जबकि PL-15E की propellant तकनीक इसे Mach-5+ तक सक्षम बनाती है। Seeker के मामले में, Astra में active seeker है, पर PL-15E में AESA-type active seeker और advanced anti-jamming क्षमताएँ मौजूद हैं। DRDO इस अध्ययन से seeker sophistication, propulsion, anti-jamming और networked engagement जैसी तकनीकों में संभावित सुधार की पहचान कर सकता है।
भारत की रक्षा तकनीक में हाल के वर्षों में कई अभिनव प्रयोग देखने को मिले हैं। इन्हीं में से एक था ट्रेन से मिसाइल लॉन्च करने का सफल परीक्षण, जिसने दुनिया का ध्यान भारत की रणनीतिक क्षमता की ओर खींचा। इस प्रयोग ने दिखाया कि भारत अब केवल पारंपरिक लॉन्च प्लेटफॉर्म तक सीमित नहीं, बल्कि Mobile और Flexible Launch Systems की दिशा में भी तेजी से आगे बढ़ रहा है। यह वही सोच है जो DRDO जैसे संस्थान को निरंतर प्रयोग और नवाचार के लिए प्रेरित करती है — चाहे बात ट्रेन से लॉन्च की हो या दुश्मन की मिसाइल से सीख लेने की।
Operation Sindoor के दौरान मिली Chinese Missile PL-15E भारत के लिए एक दुर्लभ तकनीकी अवसर हो सकती है। यह घटना केवल एक मिसाइल के अध्ययन तक सीमित नहीं, बल्कि भारत की रक्षा अनुसंधान यात्रा में एक नई दिशा का संकेत है। DRDO इस intact मिसाइल से AESA seeker, propulsion system, anti-jamming और data-link जैसी आधुनिक तकनीकों को समझने का प्रयास कर रहा है, जिससे Astra जैसी स्वदेशी मिसाइल प्रणालियाँ और अधिक सटीक, तेज और विश्वसनीय बन सकें।
इतिहास गवाह है कि कई देशों ने दुश्मन की छोड़ी तकनीकों का अध्ययन कर अपनी क्षमताएँ बढ़ाई हैं—और अब भारत भी उसी राह पर है। यह Reverse Engineering नहीं, बल्कि Strategic Learning का उदाहरण है, जहाँ हर तकनीकी अध्ययन आने वाले समय में भारत को न केवल आत्मनिर्भर बनाएगा, बल्कि वैश्विक रक्षा प्रौद्योगिकी के मंच पर एक सशक्त और आत्मविश्वासी शक्ति के रूप में स्थापित करेगा।