एक समय था जब दिल वालों की दिल्ली को “Pulse of the Nation” कहा जाता था — जहाँ राजाओं-महाराजाओं का रुतबा, महलों की भव्यता और संस्कृति की रौनक दिखती थी। लेकिन वक्त के साथ वह चमक अब धुंध में बदल चुकी है। बीते 10–12 सालों में खासकर सर्दियों के मौसम में ऐसा लगता है मानो यह शहर अब रहने लायक नहीं रहा। सर्दियों में Delhi Pollution साल दर साल एक विकराल रूप लेता जा रहा है।
आज दिल्ली धीरे-धीरे एक “टॉक्सिक गैस चेंबर” में तब्दील हो रही है। हवा में मौजूद जहर WHO की निर्धारित सीमा से कई गुना ज्यादा है। लाखों लोग जहरीली हवा में सांस लेने के लिए मजबूर हैं। सोशल मीडिया पर लोग अपने Air Purifiers की जाली दिखाते हैं — जो कुछ ही दिनों में काली पड़ जाती है। लेकिन असली सवाल यह है कि जब मशीनें ही घुटने लगी हैं, तो हमारे फेफड़े कितने दिन टिक पाएँगे?
एक अध्ययन के अनुसार, “दिल्ली की हवा में एक दिन साँस लेना लगभग 25–30 सिगरेट पीने के बराबर है।” और इसी जहरीली हवा की वजह से एक सामान्य व्यक्ति की उम्र औसतन 8 साल तक कम हो जाती है।

क्या यह विकराल रूप लेता हुआ Delhi Pollution प्राकृतिक है या मानव निर्मित?
विशेषज्ञों के अनुसार, दिल्ली का 90% प्रदूषण मानव-निर्मित (Man-made) है। हम ही इस जहरीले वातावरण के निर्माता हैं। हवा में घुल चुके SO₂, NO₂, PM2.5, PM10, PM1 जैसे कण इतने सूक्ष्म हैं कि हमें दिखाई भी नहीं देते, लेकिन यह हमारे फेफड़ों और रक्त तक पहुँचकर शरीर को धीरे-धीरे जहर देते रहते हैं। इसके साथ ही ग्राउंड ओजोन (O₃) जैसी गैसें वातावरण में मौजूद अन्य तत्वों से प्रतिक्रिया करके और भी खतरनाक मिश्रण तैयार करती हैं।
दिल्ली की भौगोलिक स्थिति इस समस्या को और बढ़ा देती है। यह एक “कटोरे” (bowl) जैसी आकृति में बसी है — उत्तर और उत्तर-पूर्व से हिमालय, पश्चिम से अरावली और ऊपर से तापमान उलटाव (temperature inversion) यहाँ के प्रदूषण को काफी हद तक यहीं पे फँसा के रख देते हैं।
हम खुद इस “कटोरे” में जहर भरते जा रहे हैं और फिर प्रकृति को दोष देते हैं कि दिल्ली की भौगोलिक स्थितियों ने Delhi Pollution को यहीं फँसा के रख दिया है।
Delhi Pollution के मुख्य कारण:
Delhi Pollution का कोई एक निश्चित स्रोत नहीं है। यहाँ और इसके आस-पास के इलाकों में होने वाली हर गतिविधि अपने आप में दिल्ली की प्रदूषण अव्यवस्था में योगदान करती है। जैसे-
- वाहन उत्सर्जन (Vehicle Emissions): 31.1%
- सड़क की धूल (Road Dust): 25.6%
- उद्योग (Industries): 14.4%
- निर्माण व ध्वस्तीकरण (Construction & Demolition): 7.8%
- पराली व बायोमास जलाना (Stubble & Biomass Burning): 10%
- कचरा जलाना (Waste Burning): 5.6%
- अन्य स्रोत (Other Sources): 5.6%

साथ ही, जन परिवहन (Public Transport) की कमी भी बड़ी समस्या है। मेट्रो को भले ही सस्ता, सुलभ और प्रदूषण रहित कहा गया हो, लेकिन घर से मेट्रो तक पहुँचने और मेट्रो से गंतव्य तक जाने में ई-रिक्शा या निजी वाहनों पर निर्भरता इसे महँगा बना देती है। और फिर से बात निजी वाहनों पे आ के रुक जाती है।
पराली जलाना: किसानों की मजबूरी या अपराध?
हर साल सर्दियों में जब दिल्ली की हवा सबसे ज्यादा जहरीली होती है, तब चर्चा होती है पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों की — जो पराली जलाते हैं। लेकिन क्या यह उनका शौक है या मजबूरी?
जहाँ तक पराली जलाने की बात है, उसमें अब काफी कमी आई है पर इसके बारे में हमें पता होना बहुत जरुरी है। पराली जलाने का समय वो समय होता है, जब धान की फसल(खरीफ) की कटाई हो चुकी होती है और गेहूँ(राबी) की बुवाई होने वाली होती है। अब मशीनों से धान की फसल की कटाई हो तो जाती है पर उसके तने का नीचे वाला कुछ हिस्सा फसल काटने के बाद भी वैसा ही रह जाता है जिसे आम बोलचाल में पराली कहा जाता है।
अब हमारे किसान अन्य खर्चों से बचने के लिए उस पराली को जला देते हैं, जिससे उनका न तो कोई खर्चा आता है, और कम मेहनत और कम खर्चे में उनका काम भी हो जाता है। साथ ही साथ पराली जलने के बाद बची हुई राख उन खेतों के लिए अच्छी भी मानी जाती है।
अब अगर हम कुछ समय पहले जा के ग्रीन रेवोलुशन से पहले की बात करें, तो उस समय पर हमारा जो पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश का क्षेत्र है, वो गेहूँ उगाने के लिए सर्वोत्तम हुआ करता था। पर ग्रीन रेवोलुशन आने की वजह से यहाँ पर धान को बहुत ज्यादा मात्रा में उगाने की होड़ मच गई। यहाँ पर बासमती चावल की बहुत सारी किस्में भी पैदा की जाने लगी, जिनका विदेशों में निर्यात होने लगा बहुत अच्छे प्रॉफिट के साथ।
और ये तो हमें पता ही है कि चावल को उगाने के लिए बहुत सारा पानी चाहिए होता है, क्यूँकि बीज लगाने के बाद खेत पानी के भरे हुए होने चाहिए। अब उसके लिए किसानों ने जमीन के अंदर से पानी निकालना शुरू किया, और ज्यादा Ground Water का इस्तेमाल होने की वजह से Ground Water में भी कमी आने लगी। तो उसके बाद पंजाब सरकार “punjab representation of sub-soil water act-2009” ले के आई, तो इसकी वजह से किसानों के लिए पराली जलाना और भी ज्यादा जरुरी हो गया। वो समझते हैं कैसेー
पहले धान की रोपाई मई के महीने में हो जाया करती थी, और अक्टूबर के महीने में फसल को भी काट लिया जाता था। फिर नवम्बर में गेहूँ की बुवाई और मार्च-अप्रैल में उसकी कटाई भी हो जाती थी और ये चक्र साल दर साल चलता रहता था। पर “punjab representation of sub-soil water act-2009” आने के बाद किसानों ने धान की रोपाई लगाने का काम 1 महीने की देरी से करना शुरु किया क्यूँकि उनकी अत्यधिक पानी की माँग को मानसून की बारिश का पानी पूरा कर सकता था।
इस वजह से अब धान की रोपाई मई के बजाय जून में होना शुरु हुई तो फसल भी नवम्बर में तैयार होने लगी। ऐसा होने पर गेहूँ की बुवाई के लिए किसानों के पास अब बहुत ही कम समय बचने लगा। तो पराली से सबसे कम खर्चे में और सबसे कम समय में छुटकारा पाने का सबसे आसान तरीका उसे जलाने के अलावा और क्या हो सकता था।
Delhi Pollution और उप-महाद्वीपीय हवाओं का रुख:
अगर हम हवाओं के चलने की बात करें तो अक्टूबर-नवम्बर के समय में भारतीय उपमहाद्वीप के आस-पास की हवाओं का रुख बदल जाता है। हवाएँ उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व की तरफ चलने लगती हैं, जिसकी वजह से वो हवाएँ थार रेगिस्तान से धूल के कण और हरियाणा, पंजाब की पराली जलने से पैदा हुए धुएँ को दिल्ली की तरफ ले के आती हैं। यहाँ तक की पाकिस्तान में पराली जलाने से पैदा हुए धुएँ को भी ये हवाएँ दिल्ली की तरफ ही ले के आती हैं, जिससे Delhi Pollution को और ज्यादा बढ़ावा मिलता है।
इस दौरान एक और प्राकृतिक घटना होती है, उत्तर-पश्चिम से तो ये हवाएँ आ ही रही होती हैं जिनकी हमने अभी बात की थी- पूर्व से भी पूर्वी हवाएँ आ रही होती हैं, और ये दोनों हवाएँ दिल्ली के आस-पास के क्षेत्र में ही आ के मिलती हैं। और इनके द्वारा लाया गया प्रदूषण भी इसी क्षेत्र में इकठ्ठा होता जाता है।
Delhi Pollution और Temperature Inversion:
सर्दियों में दिल्ली और आसपास के क्षेत्र में Temperature Inversion (तापमान व्युत्क्रमण) नामक एक प्राकृतिक घटना होती है। यह एक मौसम संबंधी घटना है जिसमें ऊँचाई बढ़ने के साथ तापमान घटता नहीं, बल्कि बढ़ता है। साथ ही साथ गर्म हवा की एक परत ठंडी, घनी हवा के ऊपर बैठ जाती है। इस वजह से प्रदूषक ऊपर नहीं जा पाते और नीचे ही फँस जाते हैं। नतीजतन दिल्ली-NCR एक “Pollution Dome” बन जाता है जहाँ प्रदूषित हवा एक ही क्षेत्र में फँसी रह जाती है।

Delhi Pollution और Western Disturbances(पश्चिमी विक्षोभ):
पश्चिमी-विक्षोभ एक भूमध्य-सागर से उत्पन्न होने वाली अ-मानसूनी तूफानी प्रणाली है जो सर्दियों में भारत के उत्तर-पश्चिमी हिस्सों में बारिश लाती है। पर जलवायु परिवर्तन और Global Warming की वजह से पश्चिमी-विक्षोभ में भी परिवर्तन आ रहा है। वैसे तो ये सर्दियों में होने वाली घटना है परन्तु अब यह मानसून के समय में ही देखने को मिल जाता है और सर्दियों में इसकी तीव्रता कम देखने को मिलती है। अब अगर सर्दियों में दिल्ली और आस-पास के क्षेत्रों में बारिश नहीं होगी तो Delhi Pollution बढ़ेगा ही।
Delhi Pollution और Cloud Seeding की कोशिश:
Oct-2025 में सरकार ने “Cloud Seeding” का प्रयोग किया — यानी कृत्रिम बारिश कराकर हवा को साफ करने की कोशिश। हालाँकि मौसम की अनुकूलता न होने के कारण यह प्रयोग सफल नहीं हो सका। इससे यह स्पष्ट हुआ कि तकनीक अस्थायी राहत तो दे सकती है, लेकिन जड़ से समस्या को नहीं मिटा सकती।
दिल्ली का भूगोल — एक फँसा हुआ शहर और बढ़ता Delhi Pollution:
अगर भारत के ऊँचाई मानचित्र (Elevation Map) को देखें तो पूरा Indo-Gangetic Plain एक “Bowl” यानी कटोरे जैसी संरचना में है। उत्तर में हिमालय की दीवार, पश्चिम में अरावली की श्रेणी, पूर्व में गंगा का मैदानी क्षेत्र और ऊपर से Temperature Inversion — इन सबके बीच दिल्ली ऐसी जगह पर है जहाँ हवा का प्राकृतिक प्रवाह सीमित है। इसके अलावा ऊँची-ऊँची इमारतें बची-खुची हवा को भी रोक देती हैं। परिणामस्वरुप — प्रदूषक फँस जाते हैं, और यह शहर एक गैस चेंबर में तब्दील हो जाता है।
गवर्नेंस की नाकामी और प्रदूषण का बिजनेस:
जहाँ एक ओर सरकारें समाधान ढूँढ़ने में असफल दिखती हैं, वहीं दूसरी ओर एक नया बाजार फल-फूल रहा है। दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (DPCC) का 2024–25 का बजट सिर्फ ₹3.9 करोड़ है। इसके विपरीत, भारत का एयर प्यूरीफायर मार्केट ₹700 करोड़ को पार कर चुका है और हर साल 30% की दर से बढ़ रहा है।
यानि साफ है — Delhi Pollution से सिर्फ नुकसान ही नहीं, कुछ लोग मुनाफा भी कमा रहे हैं। जैसे गर्मियों में एयर कंडीशनर और सर्दियों में हीटर जरूरी बन चुके हैं, वैसे ही आने वाले समय में एयर प्यूरीफायर दिल्ली जैसे शहरों में “Basic Necessity” बन जाएँगे।
दिल्ली का बदलता समाज — पलायन और वर्गीय बदलाव:
इस Delhi Pollution के संकट ने दिल्ली की सामाजिक संरचना को भी बदलना शुरू कर दिया है। धनवान वर्ग अब इस जहरीली हवा से बचने के लिए कुछ हफ्तों या महीनों के लिए दिल्ली छोड़ देता है। कुछ लोग स्थायी रूप से “Peri-Urban” इलाकों या विदेशों में बसने लगे हैं। वहीं दूसरी ओर, दिल्ली की अर्थव्यवस्था अब भी आसपास के राज्यों — उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड और हिमांचल — से आने वाले श्रमिकों पर निर्भर है। इससे शहर की Class Composition तेजी से बदल रही है — अमीर लोग बाहर जा रहे हैं, और गरीब वर्ग काम की तलाश में भीतर आ रहा है।
दिल्ली ही नहीं, पूरी दुनिया की हवा तब से जहरीली होने लगी जब इंसान ने मशीनों से दोस्ती कर ली। 18वीं सदी में शुरू हुई पहली औद्योगिक क्रांति (First Industrial Revolution) मानव इतिहास की दिशा बदल गई — लेकिन इसके साथ ही प्रदूषण का युग भी शुरू हुआ। कोयले की भट्ठियों से निकलता धुआँ, फैक्ट्रियों की चिमनियाँ और तेजी से बढ़ता शहरीकरण धीरे-धीरे हमारे पर्यावरण पर भारी पड़ने लगा। आज दिल्ली की जो स्थिति है, वह उसी औद्योगिक लालच और अनियंत्रित विकास की एक लंबी कड़ी का हिस्सा है।
Delhi Pollution केवल सरकार या किसानों की समस्या नहीं है — यह हर उस इंसान की जिम्मेदारी है जो इस शहर में सांस लेता है। हम तकनीक, कानून और नीति पर निर्भर रह सकते हैं, लेकिन जब तक हम अपने व्यवहार नहीं बदलेंगे, समाधान अधूरा रहेगा। कम वाहन चलाना, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग बढ़ाना, पेड़ लगाना और सबसे महत्वपूर्ण — जिम्मेदारी की भावना अपनाना। अगर हमने अब भी कदम नहीं उठाए, तो आने वाले वर्षों में “स्वच्छ हवा” दिल्ली वालों के लिए बस एक सपना बन के रह जाएगा।