भारत और बांग्लादेश — दो ऐसे पड़ोसी देश जिनकी सीमाएँ ही नहीं, इतिहास और संस्कृति भी एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हैं। कभी दोस्ती की मिसाल बने ये रिश्ते कई बार विवादों और राजनीतिक मतभेदों से भी गुजरे हैं। फिर भी हर दौर में इन दोनों देशों ने साथ चलने की कोशिश की है। आज जब दक्षिण एशिया की राजनीति तेजी से बदल रही है, तो यह समझना जरूरी है कि India Bangladesh संबंध किस दिशा में बढ़ रहे हैं और इनका भविष्य कैसा दिखता है।
India Bangladesh संबंधों का ऐतिहासिक दृष्टिकोण:
India Bangladesh के संबंधों की जड़ें इतिहास में गहराई तक फैली हैं। 1947 में भारत के विभाजन के साथ ही पूर्वी बंगाल (जो आगे चलकर पूर्वी पाकिस्तान बना) का भारत से सीधा संबंध टूट गया। भौगोलिक रूप से करीब होने के बावजूद, पाकिस्तान के पूर्वी और पश्चिमी हिस्सों के बीच की दूरी और सांस्कृतिक असमानता ने असंतोष को जन्म दिया।
इस असंतोष का परिणाम 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के रूप में सामने आया, जिसमें भारत ने निर्णायक भूमिका निभाई। भारत ने न सिर्फ लाखों शरणार्थियों को शरण दी, बल्कि पाकिस्तान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई कर बांग्लादेश को स्वतंत्रता दिलाने में मदद की। इस युद्ध के परिणामस्वरूप 16 दिसंबर 1971 को बांग्लादेश एक नए राष्ट्र के रूप में उभरा।
उस दौर में भारत और बांग्लादेश के रिश्ते दोस्ती, सहयोग और आपसी सम्मान के प्रतीक माने जाते थे। इंदिरा गांधी और शेख मुजीबुर रहमान की राजनीतिक समझदारी ने दोनों देशों के बीच विश्वास की नींव रखी। हालांकि, आने वाले दशकों में राजनीतिक परिवर्तन और क्षेत्रीय राजनीति ने इस रिश्ते में कई उतार-चढ़ाव भी लाए।

1970 के बाद के दशकー सहयोग से मतभेद तक:
1971 की जीत के बाद भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में एक नई ऊर्जा थी। दोनों देशों के बीच मित्रता संधि (Treaty of Friendship, Cooperation and Peace) पर हस्ताक्षर हुए, जिसका मकसद राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक सहयोग को मजबूत करना था। भारत ने युद्ध के बाद पुनर्निर्माण में बांग्लादेश की मदद की, जबकि बांग्लादेश ने भारत को अपने सबसे भरोसेमंद सहयोगी के रूप में देखा।
लेकिन यह “स्वर्ण युग” ज्यादा लंबा नहीं चला। 1975 में बांग्लादेश के संस्थापक नेता शेख मुजीबुर रहमान की हत्या के बाद देश में सत्ता परिवर्तन हुआ, और इसके साथ ही भारत–बांग्लादेश संबंधों की दिशा भी बदल गई। नई सरकारों ने भारत से थोड़ी दूरी बनानी शुरू की और कई बार पाकिस्तान तथा चीन की ओर झुकाव दिखाया।
1980 के दशक में सीमा विवाद, अवैध प्रवास और नदी जल बंटवारे के मुद्दे सामने आए। इन मतभेदों ने रिश्तों में ठंडक ला दी। हालांकि, 1990 के बाद दोनों देशों में लोकतांत्रिक सरकारों की वापसी के साथ संवाद और सहयोग का सिलसिला फिर से शुरू हुआ।
कुल मिलाकर, स्वतंत्रता के बाद के दशकों ने यह साबित किया कि भारत और बांग्लादेश के रिश्ते सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि समय-समय पर बदलती परिस्थितियों और नेतृत्व की नीतियों पर भी निर्भर रहे हैं।
India Bangladesh के बीच प्रमुख विवाद:
भारत और बांग्लादेश के बीच दोस्ताना रिश्तों के बावजूद कई ऐसे मुद्दे हैं जिन्होंने समय-समय पर इन संबंधों में तनाव पैदा किया है। ये विवाद सीमाओं से लेकर जल बंटवारे और सुरक्षा तक फैले हुए हैं।
सीमा विवाद और अवैध घुसपैठ:
भारत और बांग्लादेश की साझा सीमा लगभग 4,096 किलोमीटर लंबी है — जो भारत की सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय सीमा है। इस विशाल सीमा पर घुसपैठ, तस्करी और सीमा पार हिंसा जैसी घटनाएँ अक्सर होती रही हैं। कई दशकों तक “एन्क्लेव्स” (छोटे-छोटे भूभाग जो एक देश के भीतर दूसरे देश के थे) को लेकर भी विवाद बना रहा। हालांकि, 2015 में हुए Land Boundary Agreement (भूमि सीमा समझौते) ने इस पुराने विवाद को समाप्त कर दिया, जिससे दोनों देशों के बीच विश्वास काफी बढ़ा।
तीस्ता नदी जल बंटवारा विवाद:
India Bangladesh के बीच सबसे बड़ा जल विवाद तीस्ता नदी को लेकर है। यह नदी सिक्किम से निकलकर बांग्लादेश में बहती है और लाखों लोगों की आजीविका इससे जुड़ी है। बांग्लादेश का मानना है कि भारत पर्याप्त मात्रा में पानी नहीं छोड़ता, जिससे उनके उत्तरी इलाकों में खेती प्रभावित होती है। हालांकि इस मुद्दे पर कई दौर की बातचीत हो चुकी है, लेकिन अभी तक कोई औपचारिक समझौता नहीं हो पाया है, मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल सरकार के विरोध के कारण।
गंगा नदी और फरक्का बैराज विवाद:
1975 में भारत ने पश्चिम बंगाल के फरक्का में एक बड़ा बैराज बनाया ताकि कोलकाता बंदरगाह में गाद जमाव को रोका जा सके और नौवहन बेहतर हो। लेकिन बांग्लादेश का कहना है कि इससे गंगा नदी का प्राकृतिक प्रवाह कम हो गया, जिसके कारण उसके कई इलाकों में जल संकट, कृषि हानि और पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न हुईं। लंबे विवाद के बाद 1996 में दोनों देशों ने गंगा जल संधि (Ganges Water Treaty) पर हस्ताक्षर किए, जिसने 30 साल के लिए जल वितरण का फार्मूला तय किया। फिर भी, सूखे के मौसम में पानी की उपलब्धता को लेकर असहमति आज भी बनी हुई है।
सीमा पार अपराध और सुरक्षा चिंताएँ:
सीमा पर गाय तस्करी, ड्रग्स तस्करी और अवैध व्यापार जैसी घटनाएँ दोनों देशों के बीच तनाव का कारण रही हैं। भारत की चिंता यह भी रही है कि कभी-कभी उग्रवादी समूह बांग्लादेश की भूमि का इस्तेमाल भारत-विरोधी गतिविधियों के लिए कर सकते हैं। हालाँकि, हाल के वर्षों में बांग्लादेश की शेख हसीना सरकार ने इस दिशा में कड़े कदम उठाए और सुरक्षा सहयोग को नई मजबूती दी।
2024 में बांग्लादेश की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला, जब शेख हसीना की सरकार के पतन के बाद नोबेल पुरस्कार विजेता प्रोफेसर मोहम्मद यूनुस को देश का मुख्य सलाहकार (Chief Adviser) नियुक्त किया गया। यूनुस की अस्थायी सरकार ने बांग्लादेश में लोकतांत्रिक पुनर्गठन और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए कई कदम उठाए। हालाँकि, कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इस राजनीतिक परिवर्तन से भारत–बांग्लादेश संबंधों में नई जटिलताएँ उत्पन्न हुई हैं, क्योंकि यूनुस प्रशासन क्षेत्रीय मामलों में एक अलग और स्वतंत्र दृष्टिकोण अपनाता दिख रहा है, जो कभी-कभी भारत के रणनीतिक हितों से पूरी तरह मेल नहीं खाता।
India Bangladesh के बीच अन्य समझौते और सहयोग के क्षेत्र:
भारत और बांग्लादेश के बीच संबंध सिर्फ राजनीति या सुरक्षा तक सीमित नहीं हैं, बल्कि आर्थिक, ऊर्जा और संपर्क (connectivity) के क्षेत्रों में भी बहुत महत्वपूर्ण हैं। दोनों देशों के बीच कई व्यापार और सहयोग समझौते (India Bangladesh Trade Agreements) हुए हैं, जिनका उद्देश्य पारस्परिक विकास को बढ़ावा देना है।
मैत्री एक्सप्रेस (Maitree Express) और बंधन एक्सप्रेस (Bandhan Express) जैसी रेल सेवाएँ दोनों देशों के बीच जन–जन के संपर्क को मजबूत करती हैं। इसके अलावा, BBIN (Bangladesh–Bhutan–India–Nepal) पहल के तहत क्षेत्रीय परिवहन और व्यापार को आसान बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाए गए हैं। ऊर्जा क्षेत्र में भी भारत और बांग्लादेश के बीच बिजली व्यापार (Electricity Trade) विगत वर्षों में काफी बढ़ रहा था, पर 2024 के बांग्लादेशी सत्ता परिवर्तन के बाद उसमें कुछ उलझनें देखने को मिली हैं।

भारत के पूर्वोत्तर राज्यों (North Eastern States) की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि उनकी मुख्य भूमि की भारत से सीधी कनेक्टिविटी के लिए बांग्लादेश का सहयोग अत्यंत आवश्यक है। इसी कारण भारत, बांग्लादेश के साथ सड़क, जलमार्ग और डिजिटल कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स को प्राथमिकता दे रहा है, ताकि सीमावर्ती इलाकों में व्यापार, आवागमन और निवेश के नए अवसर खोले जा सकें।
India Bangladesh के बीच राजनीतिक और कूटनीतिक मतभेद:
भारत–बांग्लादेश संबंधों में जहाँ एक ओर मजबूत सहयोग दिखता है, वहीं कुछ राजनीतिक और कूटनीतिक मतभेद (India–Bangladesh Diplomacy Challenges) भी समय-समय पर सामने आते रहे हैं। नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) को लेकर बांग्लादेश ने कई बार चिंता जताई है, क्योंकि इन नीतियों का सीधा असर सीमावर्ती इलाकों में India Bangladesh संबंधों पर पड़ सकता है।
इसके अलावा, क्षेत्र में चीन की बढ़ती मौजूदगी (Chinese Influence) ने भी नई कूटनीतिक चुनौतियाँ खड़ी की हैं। बांग्लादेश ने हाल के वर्षों में चीन के साथ बुनियादी ढांचा, रक्षा और निवेश से जुड़े कई समझौते किए हैं, जिसे भारत क्षेत्रीय रणनीतिक संतुलन के लिए सावधानी से देखता है। साथ ही साथ मोहम्मद यूनुस के बांग्लादेशी मुख्य सलाहकार बनने के बाद कुछ हद तक पाकिस्तान की मौजूदगी भी बांग्लादेश में बढ़ी है, जो भारत के लिए चिंता का विषय है।
बांग्लादेश की घरेलू राजनीति का असर भी इन रिश्तों पर गहरा पड़ा है — शेख हसीना की सरकार के दौरान भारत और बांग्लादेश के बीच कूटनीतिक तालमेल काफी मजबूत था, लेकिन 2024 में हुए राजनीतिक परिवर्तन के बाद मोहम्मद यूनुस की नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने विदेश नीति में अधिक स्वतंत्र और बहु–ध्रुवीय (multi-polar) रुख अपनाया है। इस बदलाव ने India Bangladesh संबंधों को एक नए और अधिक जटिल दौर में प्रवेश कराया है, जहाँ सहयोग के साथ-साथ प्रतिस्पर्धा और रणनीतिक संतुलन दोनों की भूमिका अहम होती जा रही है।
India Bangladesh रिश्तों के आर्थिक और सांस्कृतिक पहलू:
भारत और बांग्लादेश के बीच रिश्ते सिर्फ कूटनीति या सीमाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनका गहरा आर्थिक और सांस्कृतिक जुड़ाव (India–Bangladesh Trade and Culture) भी है। दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार हर साल नए रिकॉर्ड बना रहा है — भारत बांग्लादेश के लिए दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। भारत बांग्लादेश को पेट्रोलियम उत्पाद, मशीनरी, खाद्य पदार्थ और दवाइयाँ निर्यात करता है, जबकि बांग्लादेश से वस्त्र, जूट उत्पाद और कृषि वस्तुएँ भारत में आती हैं।
संस्कृति के स्तर पर भी दोनों देशों के बीच जुड़ाव बेहद पुराना है। रवींद्रनाथ टैगोर, काजी नजरुल इस्लाम, और बंगाली साहित्य जैसी साझा धरोहरें दोनों समाजों को एक भावनात्मक सूत्र में बाँधती हैं। फिल्म और संगीत के क्षेत्र में भी सहयोग बढ़ा है — बांग्लादेशी कलाकार भारतीय फिल्मों और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर नजर आते हैं, वहीं भारतीय संगीत बांग्लादेश में बेहद लोकप्रिय है।
पर्यटन (Tourism) भी India Bangladesh संबंधों का एक अहम पहलू बन गया है। धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों — जैसे मायामति, राजशाही, शांतिनिकेतन और गुवाहाटी के जरिए दोनों देशों के लोग एक-दूसरे की संस्कृति और इतिहास से जुड़ते हैं। इन सबके कारण भारत–बांग्लादेश संबंध केवल रणनीतिक नहीं, बल्कि भावनात्मक और सांस्कृतिक रूप से भी गहराई प्राप्त कर चुके हैं।
India Bangladesh के रिश्तों का क्षेत्रीय और वैश्विक परिप्रेक्ष्य:
भारत और बांग्लादेश के संबंध केवल द्विपक्षीय सीमाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनका प्रभाव पूरे दक्षिण एशिया (South Asia Relations) और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र (Indo-Pacific Region) की भू-राजनीति पर पड़ता है। दोनों देश कई क्षेत्रीय मंचों जैसे BIMSTEC (Bay of Bengal Initiative for Multi-Sectoral Technical and Economic Cooperation), SAARC (South Asian Association for Regional Cooperation) और IORA (Indian Ocean Rim Association) के सक्रिय सदस्य हैं।
BIMSTEC के माध्यम से भारत और बांग्लादेश, दक्षिण और दक्षिण–पूर्व एशिया को जोड़ने वाले सेतु की भूमिका निभा रहे हैं। वहीं SAARC मंच पर, दोनों देश क्षेत्रीय एकता और आतंकवाद के खिलाफ़ साझा नीति पर काम करते हैं। भारत की Act East Policy और Neighbourhood First Policy में बांग्लादेश की भूमिका रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह देश भारत को दक्षिण–पूर्व एशिया से जोड़ने वाले द्वार (gateway) के रूप में उभर रहा है।
वैश्विक स्तर पर, Indo-Pacific रणनीति के तहत भारत और बांग्लादेश दोनों ही आर्थिक, समुद्री सुरक्षा और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा रहे हैं। इन संस्थाओं में भागीदारी से न केवल भारत–बांग्लादेश संबंधों की दिशा तय होती है, बल्कि यह पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र की स्थिरता, विकास और शक्ति-संतुलन (power balance) को भी प्रभावित करती है।
India Bangladesh संबंधों का भविष्य और संभावनाएँ:
भारत–बांग्लादेश संबंधों का भविष्य अवसरों और चुनौतियों दोनों से भरा हुआ है। भले ही दोनों देशों के बीच राजनीतिक मतभेद और सीमा–सुरक्षा से जुड़े विवाद बने हुए हैं, लेकिन इन संबंधों की जड़ें आपसी विश्वास, ऐतिहासिक सहयोग और भौगोलिक निकटता में गहराई से जुड़ी हैं। भविष्य में भारत और बांग्लादेश के बीच ऊर्जा, कनेक्टिविटी, व्यापार, जल-साझेदारी और सुरक्षा सहयोग जैसे क्षेत्रों में सहयोग और बढ़ने की पूरी संभावना है। BBIN (Bangladesh–Bhutan–India–Nepal) Initiative, Maitree Power Projects और Bay of Bengal connectivity corridors जैसे प्रयास दक्षिण एशिया को एक नए आर्थिक जोन के रूप में उभार सकते हैं।
हालाँकि, बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति, चीन की बढ़ती मौजूदगी, और क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन जैसी चुनौतियाँ भारत के लिए रणनीतिक चिंता का विषय बनी रहेंगी। भारत को अपनी “Neighbourhood First Policy” के तहत बांग्लादेश के साथ संवेदनशीलता और समान भागीदारी की नीति अपनानी होगी, ताकि संबंधों में स्थिरता और दीर्घकालिक विश्वास बना रहे।
संस्कृति, भाषा, और मानवीय रिश्तों की गहराई को देखते हुए,दोनों देशों के बीच सहयोग का भविष्य आशावादी है — अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति और आपसी समझ बनी रही, तो भारत और बांग्लादेश साथ मिलकर पूरे दक्षिण एशिया के लिए शांति, विकास और स्थिरता का नया मॉडल प्रस्तुत कर सकते हैं।
भारत के पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को समझने के लिए केवल बांग्लादेश ही नहीं, बल्कि नेपाल के साथ भारत के रिश्ते (India–Nepal Relations) भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। भारत और नेपाल के बीच सांस्कृतिक, धार्मिक और भौगोलिक जुड़ाव सदियों पुराना है, और इन संबंधों का सीधा प्रभाव दक्षिण एशिया की स्थिरता और भारत की विदेश नीति पर पड़ता है।
👉भारत-नेपाल सम्बन्धों पर विस्तृत विश्लेषण यहाँ पढ़ें।
भारत और बांग्लादेश के बीच संबंध सिर्फ दो पड़ोसी देशों की कहानी नहीं, बल्कि साझा इतिहास, संस्कृति और भविष्य की साझी आकांक्षाओं का प्रतीक हैं। बीते वर्षों में दोनों ने कई उतार–चढ़ाव देखे हैं, परंतु संवाद, सहयोग और पारस्परिक सम्मान ही इन रिश्तों की असली ताकत हैं। अगर यही भावना बरकरार रही, तो भारत–बांग्लादेश साझेदारी आने वाले समय में दक्षिण एशिया के विकास की सबसे मजबूत नींव साबित हो सकती है।